अपने बारे में एक वेबसाइट को अपनी जन्मतिथि,समय और स्थान भेजने के बाद यह कहना है कि-आप अपने पिछले जन्म में एक थिएटर कलाकार थे. आप कला हेतु जुनून,अपने विचारों में स्वतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं.मुझे पता नहीं यह कितना सच है लेकिन आमआदमी को अपने विचारों व अनुभव द्वारा अन्याय का विरोध व अपने अधिकारों को लेने हेतु प्रेरित करने की एक छोटी-सी कोशिश ही है उपरोक्त ब्लॉग.
हम हैं आपके साथ
कृपया हिंदी में लिखने के लिए यहाँ लिखे.
आईये! हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में टिप्पणी लिखकर भारत माता की शान बढ़ाये.अगर आपको हिंदी में विचार/टिप्पणी/लेख लिखने में परेशानी हो रही हो. तब नीचे दिए बॉक्स में रोमन लिपि में लिखकर स्पेस दें. फिर आपका वो शब्द हिंदी में बदल जाएगा. उदाहरण के तौर पर-tirthnkar mahavir लिखें और स्पेस दें आपका यह शब्द "तीर्थंकर महावीर" में बदल जायेगा. कृपया "निर्भीक-आजाद पंछी" ब्लॉग पर विचार/टिप्पणी/लेख हिंदी में ही लिखें.
हम
दोस्त के नाम पर कलंक है. चलो कुछ तो है. हम तो खुद को किसी काबिल समझते
ही नहीं थें. आज फख्र हो रहा है कि हम कलंक के काबिल तो है.
लो
दोस्तों ! मैं आपको पहले ही कहता था कि मैं अनपढ़ और गंवार/ सिरफिरा इंसान
किसी भी काबिल नहीं हूँ. मगर आप अपने प्यार और स्नेह से मुझे खजूर के पेड़
पर चढाते रहे. हम आप सब अनेकों बार कहते रहे कि आप तुच्छ इंसान को तुच्छ ही
रहने दो. हमें खजूर के पेड़ पर मत चढाओं. हममें भी अनेकों अवगुण है. हम भी
गलतियों के पुतले है. हमसे भी गलतियाँ होती है. मगर आप तो हमारी चापलूसी
करते थें शायद. फेसबुक के प्रयोगकर्त्ता हमारे इस लिंक
(जरा देखें-http://www.facebook.com/note.php?note_id=271490346234943)पर
टिप्पणी की है. श्री गोपाल झा जी (http://facebook.com/gopaljha73) तो यह
कहते हैं कि "सिरफिरा जी आप काफी घमंडी है और इतना घंमड ठीक नहीं होता है
दोस्ती के लिये आप दोस्त के नाम पर कलंक है. आप लोग को भ्रमित करते है.
जिनका स्वयं (Gopal के बारे में) के बारें में कहना है कि-निगान्हे निगाहों
से मिला कर तो देखो,हम से रिश्ता बना कर तो देखो. अपनी प्रशंसा मैं स्वयं
कैसे करूँ ? निन्दा करना मुझे आता नहीं. अब बताए कौन सही कह रहा है और कौन
झूठ कह रहा है. इसका फैसला कैसे करूँ ? कुछ मुझे रास्ता दिखाए आप सभी.
दोस्तों,
मुझे तो लगता है कि मुझे अपना बहुत बड़ा आलोचक मिल गया. आपकी क्या राय है ?
अब देखिये आलोचक द्वारा कुछ देने पर समर्थकों का भटकना स्वाभाविक है.
जैसे-सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ "जन लोकपाल" कानून बनाने की नीयत
अच्छी ना होने के श्री अन्ना हजारे के ब्यान पर सरकार के मंत्रियों ने
भटकना शुरू कर दिया. कुछ बुध्दिजीवी वर्ग के नेता तो असभ्य और सभ्य भाषा
में फर्क तक भूलकर लगे आरोप लगाने अन्ना टीम पर. इसलिए दोस्तों अपनी बात
कहते हुए सयम रखना. लोगों को भी पता चले कि सिरफिरा के दोस्त सभ्य भाषा में
अपने विचारों की अभिव्यक्ति करना जानते है. आप मेरे एक नौजवान(इनकी उम्र
कम और थोडा जवानी का जोश भी है) मित्र ने ऑनलाइन वार्तालाप में गलती कर दी
थी. इसलिए उसकी वार्तालाप भी डाल रहा हूँ.
Ankit Goyal-GUPAL
ONLINE HO GAYA H KIYA रमेश कुमार सिरफिरा-नहीं, मेरे दोस्त नहीं है वो
Ankit Goyal-YE (अपशब्द) APNE AAP KO MANTA KIYA H. रमेश कुमार
सिरफिरा-दोस्त किसी के लिए अपशब्दों प्रयोग उचित नहीं. सभ्य भाषा में बात
करें. Ankit Goyal-SOORY.RAMESH JI..रमेश कुमार सिरफिरा-उनकी गलत फहमियां
दूर की जानी चाहिए. Ankit Goyal-OK M PURI KOSIS KARONGA.रमेश कुमार
सिरफिरा-उनको कहिए आप अपनी शिकायत पूरे विस्तार से रमेश की वाल पर रखें.
आपको समाधान जरुर मिलेगा. Ankit Goyal-OK,WE ONLINE H KIYA रमेश कुमार
सिरफिरा-नहीं.
दोस्तों, हमने अपनी समझ से श्री गोपाल झा जी
को जवाब दे दिया. अब आपको उचित लगा या नहीं. इसकी आप जानो. अगर आज तक उससे
हुई फेसबुक/ऑरकुट पर ऑनलाइन बातचीत का डाटा देखना हो तो मुझे ग्यारह तारीख
तक का समय दे दो, क्योंकि मुझे अपने गुरु श्री राजीव मुनि जी महाराज के
चरणों में पहुंचना है और दो-तीन दिन उनकी सेवा करने का लाभ लेना है और उनके
ज्ञान के अमृत का रसपान करना है. उनके अनुसार पुरुषार्थ करना मनुष्य का
कर्म है. सच कहने के लिए लेखनी से किया कर्म हिंसा की परिभाषा में नहीं आता
है. हो सकता है मेरे गुरु जी या मैं गलत हो. लेकिन आपका क्या नजरिया है ?
अपने मुझे विचारों से अवगत करवाए. भटके हुए राही को क्या आप सही रास्ता
नहीं दिखायेंगे.
Gopal Jha· Friends with Manish Jain and
42 अन्य, सिरफिरा जी आप काफी घमंडी है और इतना घंमड ठीक नहीं होता है
दोस्ती के लिये आप दोस्त के नाम पर कलंक है आप लोग को भ्रमित करते है
इसलिये मैं आप से दोस्ती को खत्म कर लिया हूँ सरफिरा जी
रमेश
कुमार सिरफिरा-Gopal Jha जी, हमसे दोस्ती खत्म करने के लिए और हमारी
क्रोध से भरपूर टिप्पणी करने के लिए भी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. लेकिन
हमने अपना सब कुछ सार्वजनिक किया हुआ है. आप हमारी कौन-सी जानकारी से
भ्रमित हुए आपने जिक्र नहीं किया. आपके शब्दों में हम दोस्त के नाम पर
कलंक है. चलो कुछ तो है. हम तो खुद को किसी काबिल समझते ही नहीं थें.
हमारी आलोचना और भी करों हमें अच्छा लगता है. हम आपकी टिप्पणी को हटाएंगे
भी नहीं. अगर वो सभ्य भाषा में होगी.
दोस्तों अगर आपको फेसबुक पर इस पोस्ट को गाने के साथ सुनने का मन है. तब यहाँ पर क्लिक करो और देखों कौन व्यक्ति अपने विचार रख रहा है ?
युधवीर
सिंह लाम्बा भारतीय का कहना कि-हिंदी अति सरल और मीठी भाषा हैं। हिंदी
भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। तभी तो देश के बाहर भी हिंदी
ने अपना स्थान बना सकने में सफलता हासिल किया है।
फ़िजी, नेपाल, मोरिशोस, गयाना, सूरीनाम यहाँ तक चाइना और रसिया में भी हिंदी
अच्छी तरह बोली और पढ़ी जाती है। *हिन्दी के प्रभाव और क्षमता को अब
विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियां भी सलाम कर रही है। विश्व में मोबाइल की सबसे
बड़ी कंपनी नोकिया ने हाल ही लन्दन में अपने तीन नए मॉडल बाजार में उतारे।
आपको ये जानकर खुशी होगी कि इन तीनो मॉडल्स को कंपनी ने हिन्दी का नाम दिया
है। इन्हें अमेरिका, यूरोप और एशिया यानी पूरी दुनिया में आशा-300 और
आशा-200 मॉडल के फोन लांच किए जाएंगे। *अटल बिहारी वाजपयी वे पहले
भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ (1977) में हिंदी में भाषण देकर
भारत को गौरवान्वित किया था। (अटल बिहारी वाजपयी 1977 में विदेश मंत्री थे)
*जुरासिक पार्क जैसी अति प्रसिध्द हॉलीवुड फ़िल्म को भी अधिक मुनाफ़े के
लिए हिंदी में डब किया जाना जरूरी हो गया । इसके हिंदी संस्करण ने भारत में
इतने पैसे कमाए जितने अंग्रेजी संस्करण ने पूरे विश्व में नहीं कमाए थे ।
*अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने 114 मिलियन डॉलर की एक विशेष राशि अमरीका
में हिंदी, चीनी और अरबी भाषाएं सीखाने के लिए स्वीकृत की है । इससे
स्पष्ट होता है कि हिंदी के महत्व को विश्व में कितनी गंभीरता से अनुभव
किया जा रहा है । *हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह
विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। -
मैथिलीशरण गुप्त। *बह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन ने भी हिन्दी का समर्थन किया था। * गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए 'जन-भाषा' हिन्दी सीखने का आग्रह किया ।
*गुजराती भाषा-भाषी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मराठी-भाषा-भाषी चाचा
कालेलकर जी को सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने का
आदेश दिया। *सुभाषचंद्र बोस की 'आजाद हिन्द फौज' की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही थी। *श्री अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे।
* नागरी लिपि के प्रबल समर्थक न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र ने तो ई.
सन् 1910 में यहां तक कहा था - यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था
में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ,
'साधु हिन्दी' में वार्तालाप करूंगा।
* अहिन्दी-भाषी-मनीषियों में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था।
*अनेक देश हिंदी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, यूएई क़े
'हम एफ-एम' ,जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना
रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। *हॉलीवुड
ने पहचानी हिन्दी की ताकत – बहुचर्चित मशहूर ओर कामयाबी का नया इतिहास
रचने वाली चलचित्र ( फ़िल्म) को दिया वैश्विक हिन्दी नाम 'अवतार' ।हिंदी
शब्द अवतार का अर्थ 'अवतार' शब्द 'अव' उपसर्गपूर्वक 'तृ' धातु में 'धण'
प्रत्यय लगाकर बना है। अवतार शब्द का अर्थ यह है कि पृथ्वी में आना।हॉलीवुड
की मशहूर फ़िल्म "अवतार" दुनिया की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली चलचित्र (
फ़िल्म) बन गई है । क्या हमें अँग्रेजी की गुलामी छोडकर हिन्दी को
महत्व नहीं देना चाहिए ? दोस्तों-जब हम हिन्दुस्थान में रहते हुए भी हम
हिंदी का प्रयोग नहीं करेंगे तो क्या अमरीका व अन्य देशों के नागरिक प्रयोग
करने के लिए आयेंगे? जय हिन्द, जय भारत ! वन्दे मातरम !
रमेश कुमार जैन उर्फ सिरफिरा : हम फेसबुक पर हिंदी में कैसे लिखें ?
दोस्तों/सदस्य ध्यान दें. मेरे पास अक्सर अनेकों ईमेल/फोन आते हैं और
ऑनलाइन वार्तालाप में सबका एक ही प्रश्न होता है कि हम हिंदी में कैसे
लिखें. यह जानकारी सब सदस्यों और फेसबुक आदि प्रयोगकर्त्ता के लिए उपयोगी
होगी. ऐसा मेरा विश्वास है. अब अगर आप कुछ करके दिखाना चाहते है. तब थोडा
पढ़ें और सीखें. http://www.facebook.com/groups/anpadh/doc/216950435051713/ युधवीर सिंह लाम्बा भारतीय का कहना कि-बहुत ही सार्थक और सुंदर लेख के लिए आपका कोटि कोटि अभिनन्दन!
दोस्तों, आज मेरे दो "सिरफिरा-आजाद पंछी" और "रमेश कुमार सिरफिरा"ब्लोगों का जन्मदिन (ब्लॉग जगत के नियमानुसार) हैं. जिससे आप परिचित भी है. उसकी प्रथम अभी तो अजन्मा बच्चा हूँ मेरे दोस्तों! पोस्ट को मैं जानकारी के अभाव में 31 जुलाई को डाल पाया था. जिससे किन्ही कारणों के चलते 2 अगस्त को देखा गया था, क्योंकि मैंने उससे 31 जुलाई को केवल "सेव" कर लिया था. फिर एक अगस्त को काफी प्रयास करके उसको प्रकाशित किया था. मुझे इन्टरनेट कहूँ या ब्लॉग जगत की ए.बी.सी भी नहीं आती थी और फिर बहुत कम शिक्षा होने के कारण अंग्रेजी न आने की वजह से आज भी अंग्रेजी में आने वाली ईमेल को डिलेट कर देता हूँ. मुझे टिप्पणी आदि और किसी को लिंक कैसे भेजना होता है की जानकारी नहीं थी.
शुरू के दिनों में लगातार 20-22 घंटे कंप्यूटर पर बैठकर लगातार अध्ययन और सिर्फ अध्ययन करने के साथ प्रयास करता रहा. पहले एक पोस्ट फिर दूसरी पोस्ट भी डाल दी. मगर कोई जानकारी नहीं हो रही थीं कि कोई पढ़ भी रहा है या नहीं, क्योंकि समाचार पत्र में तो संपादक के नाम प्रशसकों और आलोचकों के पत्र आते रहते थें. संत कबीरदास के एक दोहे की प्रेरणा से आलोचकों अपने समाचार पत्र में सर्वक्ष्रेष्ट पत्र को थोडा इनाम तक देता था. इसके पीछे मेरी अपनी एक कमजोरी थीं, उसके द्वारा बताई गलतियों को दोहराने से मेरी पत्रकारिता में निखार आने लगा था और समाचार पत्र को विज्ञापन ज्यादा मिलने लग गए थें. मगर यहाँ यह व्यवस्था कैसे हो? इसकी कोई जानकारी नहीं थीं.
फिर मैंने अपने दो ब्लोगों पर एक ही तीसरी पोस्ट गुड़ खाकर, गुड़ न खाने की शिक्षा नहीं देता हूँ डाल दी.उसके बाद मुझे एक पहली टिप्पणी मिली थी. वो मेरे गुरुवर जी की थी. उस टिप्पणी के सन्दर्भ में अपनी बात रखी और कई जानकारी प्राप्त की. आप देखें वो टिप्पणी-श्री दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…एक ही काम के लिए दो ब्लाग क्यों? शब्द पुष्टिकरण हटाएँ। आप के काम समाज में सकारात्मक योगदान कर रहे हैं। Friday, August 06, 2010 6:59:00 PM उसके बाद बिमारी की हालत में गलती से बने दो ब्लोगों पर अलग-अलग विषयों से संबंधित समाचार या लेख प्रकाशित करने का विचार किया. आज आप देखते भी होंगे. यहाँ एक-एक से एक महानुभवों का जमावड़ा हैं. मैं आज भी ब्लॉग जगत की बहुत चीजों के चलते अनाड़ी हूँ और यहाँ पर बड़े-बड़े खिलाडी है. मैं भी चिंतित हूँ कि ब्लॉग जगत मीडिया के विकल्प के रूप में उभरकर आये और इसके सदस्यों की संख्या 20-50 हजार हो जाए. तकनीकी जानकारी की भाषा इतनी सरल और आम-बोलचाल में हो कि-उसको एक अनाड़ी भी उपयोग में ला सकें. मैं बहुत दिनों तक पोस्ट कैसे दिखेंगी जानकारी के कारण वंचित रहा. जिससे तकनीकी जानकारी ना हो वो वेचारा क्या करेंगा. मैं आज भी ब्लॉग जगत का ए.बी ही सीख पाया हूँ. उससे आगे सिखने के लिए बहुत सारा अध्ययन कर रहा हूँ. मगर जटिल भाषा शैली के कारण बहुत ही थोड़ा-थोड़ा सीख पा रहा हूँ. अपने गुरुवर श्री दिनेशराय द्विवेदी के मार्गदर्शन से आगे बढ़ने के प्रयास भी कर रहा हूँ . मेरे विचार से:-यहाँ पर कुछ ऐसे लेख जो "ब्लॉग कैसे बनाये" की जानकारी देते हो उसका एक कालम हो.इससे नए ब्लोग्गर को बहुत फायदा होगा. हो सकता हैं मेरे विचार सही ना हो, मगर मेरा विश्वास है.अगर ऐसा होता है. तब ब्लॉग जगत मीडिया के विकल्प के रूप में बहुत आगे तक जा सकता हैं. यहाँ पर एक ब्लॉगर डी.ए.वी.पी(भारत सरकार की सरकारी विज्ञापन रिलीज करने वाली संस्था) और मार्किटिंग पर विज्ञापन के लिए निर्भर नहीं है. बातें बहुत सी है मगर फिर कभी.............
अब एक जिज्ञासा कहूँ या जानकारी मुझे अपने ब्लॉग का जन्मदिन कब मनाना चाहिए? क्या 19 जुलाई को या 31 जुलाई को या 2 अगस्त को? वैसे मेरे विचार में मेरा ब्लॉग "दूध पीता बच्चा है" क्योंकि गर्भकाल को न गिने तो मात्र मेरा ब्लॉग आज 3 महीने और 4 दिन का है. नन्हें शिशु को थोड़ा बड़ा होने दीजिए.फिर आप इसका जन्मदिन बना लेना उचित होगा. अभी तो यह केवल दूध पर ही निर्भर है.जरा अन्न-बन्न खाने लग जाने दो. सभी महानुभवों को दूध पीते बच्चे की ओर से प्रणाम. किसी प्रकार की गुस्ताखी के लिए क्षमा करें. क्षमादान से बड़ा कोई दान नहीं है.
दोस्तों, आप सब अच्छी तरह से परिचित होंगे कि-मैं कलम का सिपाही हूँ. मगर मेरे कुछ निजी कारणों से मेरी कलम का लेखन काफी समय से बंद था. अपनी निजी समस्यों के चलते मेरा परिचय 11 जुलाई 2010 को ब्लॉग जगत से परिचय हुआ. जानकारी के अभाव में सर्वप्रथम हम उसे एक वेबसाइट समझ बैठे. मगर अचानक 19 जुलाई 10 को एक कमाल हो गया. हम अपना भी ब्लॉग बना बैठे. मगर फिर जानकारी के अभाव में अगले 12 दिनों तक उस पर कुछ नहीं लिख सकें. अब हमें ब्लॉग जगत पर लिखते हुए कोई लगभग एक साल होने को है. अपनी निजी वैवाहिक समस्याओं के चलते वैसे हमने ज्यादा नहीं लिखा. मगर जितना लिखा, उतना सच लिखा. जहाँ एक ओर ब्लॉग जगत में अनेकों मित्र मिले, दूसरी ओर क़ानूनी ज्ञान देने वाले गुरुवर श्री दिनेश राय द्विवेदी जी जैसे गुरु मिले. जिन्होंने कदम-कदम पर निराशा के बादलों को दूर करके आशा में बदलने की कोशिश की, मगर हमारी भ्रष्ट न्याय व्यवस्था में अब तक कोई सफलता नहीं मिली. लेकिन उनके मार्गदर्शन में प्रयासरत हूँ. अनेक मित्रों ने तकनीकी ज्ञान देकर काफी मदद की और कुछ हमारे सच लिखने के कारण अपने आप हमारे दुश्मन कहूँ या आलोचक बन बैठे.
हम समाचार पत्र-पत्रिकाओं से जुडे होने के कारण ब्लॉग जगत की चालों और रणनीतियों के साथ कलाकारी से बिल्कुल अनजान है. लेकिन जैसे हम अपने समाचार पत्र में भारत सरकार के विभाग आर.एन.आई के नियमों का पालन करते हुए अपना नाम, पता और फोन नं. तक हर समाचार पत्र में लिखते हैं. उसी तरह से मैंने अपने सभी ब्लोगों में अपना पता, नाम, ईमेल और फोन नं आदि सब कुछ लिखा हुआ है. आज मुझे याद भी नहीं. कब किसकी सदस्यता ली. अपने सिखने के दौरान कहीं भी पढ़ने के लिए चला जाता था और उस मंच को नियमित रूप से पढ़ने के लिए बस ईमेल डाल देता था.पता ही नहीं चलता था. कहाँ-कहाँ, क्या-क्या हो रहा है या हो जाता था. सिखने के चक्कर में इधर-उधर कहीं पर भी पंगा लेता रहता था. माउस को लेकर कहीं भी छेड़खानी(महिला से नहीं) करता रहता था. कभी कहीं से कोई अंग्रेजी में ईमेल आ जाती और पढ़ने में असमर्थ होने के कारण उस पर जगह-जगह पर क्लिक करके देखता था. बस और कुछ नहीं आता था.
जैसे जैसे मुझे थोड़ी-थोड़ी जानकारी होती गई, मेरी किसी भी चीज़ को जानने की तीव्र जिज्ञासा और सिखने की लगन और कठिन परिश्रम ने काफी कुछ सीखा दिया है. मगर दूसरे ब्लोगों में नई-नई अनेक कलाकारियों को देखते हुए आज भी अपने आपको अभी अधुरा मानता हूँ. मुझे जब महसूस हुआ कि-उपरोक्त व्यक्ति को इस चीज़ का तकनीकी या दूसरा ज्ञान है. तभी मैंने उसके आगे ज्ञान की भीख मांगने के लिए अपनी झोली फैला दी. कुछ ने दुत्कार दिया और कुछ ने ज्ञान रूपी प्रकाश डालकर मेरी झोली को भर दिया. यहाँ ब्लॉग जगत में सबसे अनाड़ी और कम पढ़ा-लिखा शायद मैं ही हूँ. इसलिए ब्लॉग जगत के विद्वान मेरे लेखन को सार्थक नहीं मानते हैं. मुझे अपनी बात को कहने के लिए कई वाक्यों का इस्तेमाल करना पड़ता है और वो उसी बात एक या दो वाक्यों में अपनी बात कह देते हैं. लेकिन मैंने अपनी पत्रकारिता और समाचार पत्रों में अपनी भाषा को बिलकुल सरल रखा. जिसे बेशक मेरे लेख कहूँ या समाचार पत्र विद्वान न भी पढ़ें, मगर जब उसका एक गरीब कहूँ कम पढ़ा-लिखा रिक्सा वाला, मोची या अन्य कोई पढ़े. तब उसको सारी बात समझ में आ जाए और उसको लगे कि-इसमें मेरे शब्दों में मेरी बात लिखी है और पढ़ते हुए ऐसा महसूस हो कि-मैं उसके सामने ही खड़ा होकर बात कर रहा हूँ.
मेरे परिवार के आर्थिक हालत ठीक नहीं होने के कारण मेरी शिक्षा भी ज्यादा नहीं हुई थी. चाहे पत्रकारिता हो या अन्य कुछ भी सब कठिन परिश्रम से सीखा है. बहुत छोटी सी उम्र से बड़े-बड़े विद्वानों और जैन गुरुओं के कथनों को सुनकर समय और हालतों के अनुरूप उनकी शिक्षा का अमल अपने जीवन में करने लगा.अध्ययन और कुछ नया विचार करने के साथ लेखन ने पता नहीं कब पत्रकार के रूप में खड़ा कर दिया पता ही नहीं चला था. मुझे आज मुकाम तक पहुचने में पुस्तकों इतना बड़ा योगदान रहा है. जिसको मैं शब्दों में ब्यान नहीं कर सकता हूँ. (क्रमश:)
प्रचार सामग्री:-दोस्तों/पाठकों,http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/SIRFIRAA-AAJAD-PANCHHI/यह मेरा नवभारत टाइम्स पर ब्लॉग. इस को खूब पढ़ो और टिप्पणियों में आलोचना करने के साथ ही अपनी वोट जरुर दो. जिससे मुझे पता लगता रहे कि आपकी पसंद क्या है और किन विषयों पर पढ़ने के इच्छुक है. नवभारत टाइम्स पर आप भी अपना ब्लॉग बनाये. मैंने भी बनाया है.एक बार जरुर पढ़ें.
यह है मेरे सच्चे हितेषी (इनको मेरी आलोचना करने के लिए धन्यवाद देता हूँ और लगातार आलोचना करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद करता हूँ) पाठकों और दोस्तों मुझसे एक छोटी-सी गलती हुई है.जिसकी सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगता हूँ. अधिक जानकारी के लिए "भारतीय ब्लॉग समाचार" पर जाएँ और थोड़ा-सा ध्यान इसी गलती को लेकर मेरा नजरिया दो दिन तक "सिरफिरा-आजाद पंछी" पर देखें. आदरणीय शिखा कौशिक जी, मुझे जानकारी नहीं थीं कि सुश्री शालिनी कौशिक जी, अविवाहित है. यह सब जानकारी के अभाव में और भूलवश ही हुआ.क्योकि लगभग सभी ने आधी-अधूरी जानकारी अपने ब्लोगों पर डाल रखी है. फिर गलती तो गलती होती है.भूलवश "श्रीमती" के लिखने किसी प्रकार से उनके दिल को कोई ठेस लगी हो और किसी भी प्रकार से आहत हुई हो. इसके लिए मुझे खेद है.मुआवजा नहीं देने के लिए है.अगर कहो तो एक जैन धर्म का व्रत 3 अगस्त का उनके नाम से कर दूँ. इस अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.
मेरे बड़े भाई श्री हरीश सिंह जी, आप अगर चाहते थें कि-मैं प्रचारक पद के लिए उपयुक्त हूँ और मैं यह दायित्व आप ग्रहण कर लूँ तब आपको मेरी पोस्ट नहीं निकालनी चाहिए थी और उसके नीचे ही टिप्पणी के रूप में या ईमेल और फोन करके बताते.यह व्यक्तिगत रूप से का क्या चक्कर है. आपको मेरा दायित्व सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए था.जो कहा था उस पर आज भी कायम और अटल हूँ.मैंने "थूककर चाटना नहीं सीखा है.मेरा नाम जल्दी से जल्दी "सहयोगी" की सूची में से हटा दिया जाए.जो कह दिया उसको पत्थर की लकीर बना दिया.अगर आप चाहे तो मेरी यह टिप्पणी क्या सारी हटा सकते है.ब्लॉग या अखबार के मलिक के उपर होता है.वो न्याय की बात प्रिंट करता है या अन्याय की. एक बार फिर भूलवश "श्रीमती" लिखने के लिए क्षमा चाहता हूँ.सिर्फ इसका उद्देश्य उनको सम्मान देना था. कृपया ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिंक देखे. पूरी बात को समझने के लिए http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html, गलती की सूचना मिलने पर हमारी प्रतिक्रिया: http://blogkeshari.blogspot.com/2011/07/blog-post_4919.html