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रविवार, जून 03, 2018

मानवता के लिए देहदान या अंगदान करें


दोस्तों, मैंने पिछले दस साल से मेरा पेंडिग यह काम ( देह दान करने का ) भी आखिर कल दिनांक 2 जून 2018 को निपटा ही दिया. इस विषय पर मेरा विचार काफी समय से बना हुआ था. इसी कड़ी में अपने नेत्रदान सन 2006 में ही कर चुका हूँ. जिसको आप इस पोस्ट (गुड़ खाकर, गुड़ न खाने की शिक्षा नहीं देता हूँपर क्लिक करके देख सकते हैं. मगर देह दान की इच्छा पूरी करने में जानकारी के अभाव में खुद को असमर्थ महसूस कर रहा था. इस विषय पर छानबीन करते-करते लगभग सन-2007 या 2008 के आसपास मुझे "दधीचि देहदान समिति" का एड्रेस कहीं से प्राप्त हुआ. तब इनकी कोई ईमेल आई डी और बेबसाईट नहीं थीं. मैंने उनके एड्रेस पर एक पत्र लिखकर अपनी इच्छा प्रकट करते हुए पूरी प्रक्रिया की जानकारी मांगी. कुछ दिनों के बाद मुझे "दधीचि देहदान समिति" का एक पत्र प्राप्त हुआ और एक अंग्रेजी में फॉर्म प्राप्त हुआ. हिंदी भाषा से प्रेम और अपनी मातृभाषा होने के कारण मैंने फिर से पत्र लिखकर इनको हिंदी में फॉर्म के साथ मुझसे सम्पर्क करने को लिखा था. 
उसके बाद काफी दिनों तक मुझे हिंदी में फॉर्म प्राप्त नहीं हुआ और न मैं ही दूबारा इनसे सम्पर्क कर पाया. फिर मैं अपनी पूर्व पत्नी के दहेज़ मांगने के झूठे केसों में फंसकर काफी डिस्टर्ब हो गया था.  दहेज़ के झूठे केसों के कारण मेरा बिजनेस और "शकुंतला प्रेस ऑफ़ इण्डिया प्रकाशन" परिवार के अंतर्गत प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र-पत्रिका आदि के साथ ही मेरे देश व समाजहित में किये जाने वाले समाजिक कार्य और समाज सेवा काफी प्रभावित हो गई. हमारे देश की सुस्त व शोषित करने वाली न्याय व्यवस्था के चलते सन-2013 के सितम्बर में मेरा तलाक हुआ. दहेज़ मांगने के झूठे केसों की पारिवारिक समस्या के चलते अपने जीवन की रेलगाड़ी को वो रफ्तार न दे सका जो देना चाहता था, क्योंकि आर्थिक, मानसिक व शारीरिक रूप से काफी टूट गया था. तलाक की प्रक्रिया में होने वाले खर्चों की वजह से ज़िन्दगी में पहली बार चाँदी के चंद कागजों का कर्जवान भी हो गया था. 
इससे पहले केवल अपनी जन्म देने वाली "माँ" का कर्जवान था. मेरे विचार जिसका कर्ज शायद ही कोई औलाद सात जन्म लेने के बाद भी उतार पाती होगी. अपनी माताश्री फूलवती जैन (अब स्वर्गीय) और परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से धीरे-धीरे (-) माइनस से (0) जीरो तक का सफर करते हुए (+) प्लस पर पहुंचा और फिर कर्ज से मुक्त हुआ. अपने सभी सहयोगी व कस्टमरों के साथ ही अपने कार्य के प्रति ईमानदारी और समपर्णभाव के कारण धीरे-धीरे अपने जीवन की रेलगाड़ी को रफ्तार देने की कोशिश में लगा हुआ हूँ.  
पिछले लगभग छह महीने पहले ही श्रीमती सरिता भाटिया पत्नी स्व. श्री यशपाल भाटिया जी की व्हाट्सअप्प पर आने वाली सूचनाओं से ज्ञात हुआ कि उनकी संस्था "यश सेवा समिति" देहदान करने के इच्छुक दानियों को देहदान करने में सहयोग कर रही है. हम दोनों ही अपने अपने निजी कार्यों में बिज़ी होने के कारण काफी समय तक आमने-सामने हमारी मुलाक़ात सम्भव नहीं हुई. कभी मैं उनके निवास स्थान पर जाता तो वो नहीं मिलती और कभी उनका मैसेज आता तो मैं अपने निजी कार्यों में बिज़ी होने के कारण जाने का समय नहीं निकाल पाता था. जैसे कहा जाता है कि हर कार्य के होने का समय ऊपर वाले के यहाँ ही निश्चित होता है. ठीक उसी प्रकार मेरे पास 31 मई से 3 जून तक का कुछ समय अपने पेडिंग कार्यों को निपटाने के लिए मिल गया. मैंने 31 मई को श्रीमती सरिता भाटिया जी को अनेक बार फोन किया. लेकिन फोन पिक न होने की स्थिति में मैंने उनको व्हाट्सअप्प पर अपना संदेश छोड़ा. उसका जबाब मुझे 1 जून की सुबह मिला. बातचीत हुई दोपहर एक बजे मिलने का समय निर्धारित हुआ. समय का पाबन्द होने की आदत के चलते ही एक बजने से 11 मिनट पहले ही उनके यहाँ पहुँच गया. डोर बेल बजाने के बाद और दरवाजा खुलने के साथ ही चार मंजिल सीढ़ियों से चढ़ने के बाद आखिर एक बजने से दो मिनट पहले ही उनकी बैठक में पहुँच चुका था. 
फिर श्रीमती सरिता भाटिया जी ने मुझे "दधीचि देहदान समिति" का देहदान करने से संबंधित सूचनाएं भरने हेतु अंग्रेजी में फॉर्म लाकर दिया. उसके बाद मैंने फॉर्म को पढ़ा और अपने हिंदी प्रेम के कारण सबसे पहले हिंदी और उसके बाद अंग्रेजी में अपनी मांगी गई सूचनाएं भरनी शुरू कर दी. फॉर्म को लगभग एक तरफ से भरने के बाद मैंने देखा कि देहदान के लिए अपने दो निकट संबंधियों की इसमें गवाही के रूप में उनकी जानकारी भरने के साथ ही उनके हस्ताक्षर भी करवाने हैं. तब मैंने श्रीमती सरिता भाटिया जी को कहा कि यह पूरी प्रक्रिया अपने घर पर फॉर्म ले जाकर ही पूरी हो पायेगी. बात ही बातों में मैंने कहा इन्होंने अभी तक अपने फॉर्म हिंदी में नहीं बनाएं. 
तभी सरिता जी कहने लगी कि हिंदी में भी फॉर्म है. उनकी यह बात सुनते ही मुझे एक बार तो ऐसा लगा कि मैंने भगवान से "जहाँ" माँगा और भगवान ने पूरा "जहाँ" मेरी झोली में डाल दिया. यानि बहुत ख़ुशी हुई. फिर उसके बाद सरिता जी से उनके और अपने कार्यों के साथ ही क्षेत्रीय समस्याओं और सामाजिक समस्याओं पर बातचीत होती रही. उसके बाद उनसे देहदान का जल्द से जल्द एक कैम्प लगाकर लोगों को जागरूक करने की बात में अपना सहयोग भी देने कहते हुए विदा ली. 
अपने घर आकर लंच करने के बाद अपने दूसरे निजी कार्यों को जल्दी से जल्दी खत्म करके देहदान का हिंदी वाला फॉर्म पूर्ण रूप से भरकर शाम को फिर से सरिता जी को कॉल किया और उनसे पूछा कि मेरा फॉर्म देने के लिए संस्था में आप कब जायेगी ? उन्होंने कहा कि कुछ दिनों में संस्था की मीटिंग होगी तभी जमा करवा दूंगी. मैंने फिर पूछा क्या मैं फॉर्म को कल स्पीड पोस्ट से उनको भेज दूँ या आपको अपने पास भी कोई देहदानियों का कोई रिकोर्ट रखना होता है. उन्होंने जबाब दिया ऐसा कुछ नहीं है और आप स्पीड पोस्ट से भी भेज सकते हो. इसके साथ ही मैंने संस्था के फॉर्म पर लिखा कि - मैंने नेत्रदान पहले से ही किये हुए है और मैं आपके सम्पर्क में लगभग दस साल पहले आया था. लेकिन उस समय आपके पास हिंदी में फॉर्म की व्यवस्था नहीं थीं. वर्तमान समय में श्रीमती सरिता भाटिया जी के सम्पर्क में आया तब मालूम हुआ कि वो आपकी संस्था के उपरोक्त कार्य में सहयोगी है. 
नोट : अगर सम्भव हो तो मेरा प्रमाण-पत्र, पहचान-पत्र व वसीयत हिंदी में बनाई जाएँ.

अगले दिन यानि दो जून 2018 को अपनी दिनचर्या के कार्यों से निपटकर जब देहदान के संबंधित दस्तावेजों को भेजने के लिए चेक करने के साथ ही तैयार कर रहा था. तभी एक विचार आया कि-क्यों न अब अपनी सोशल मीडिया (पहले फेसबुक, व्हाट्सअप्प आदि का इतना प्रचार-प्रसार नहीं था) की प्रोफाइल के माध्यम से अपनी फर्म "शकुंतला प्रेस ऑफ़ इण्डिया प्रकाशन" परिवार के माध्यम से अपने देश व समाजहित के सामाजिक कार्यों को शुरू किया जाएँ. 


फिर मैंने भविष्य को लेकर अपने विचार पर मंथन करते हुए ठोस निर्णय लिया और देहदान के संबंधित सभी दस्तावेजों को भली-भांति चेक करने के बाद उनकी फोटोस्टेट कॉपी करवाकर अपने पास रखने के साथ ही डाक ऑफिस में जाकर "दधीचि देहदान समिति" के नाम पर स्पीड पोस्ट नम्बर ED784653547IN बुक करवाई. मैंने दो जून का अपना सबसे पहला यह ही कार्य किया था. उसके बाद अपने फील्ड के निजी अन्य कार्यों को अंजाम दिया. जो चित्र में ऊपर व निम्नलिखित है.   
     

दोस्तों,  मैंने कल दो जून 2018 को अपनी देहदान करने के समय ही एक निर्णय लिया है कि मेरी फर्म "शकुंतला प्रेस ऑफ़ इण्डिया प्रकाशन" परिवार के माध्यम से हर महीने देहदान करने वाले पहले आने वाले दो व्यक्तियों का दान (150 रूपये प्रत्येक व्यक्ति) जो "दधीचि देहदान समिति" संस्था को देना होता है. वो दान की राशि "शकुंतला प्रेस ऑफ़ इण्डिया प्रकाशन" परिवार अपने बैंक खाते से अदा करेगा और भविष्य में अपने समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनका  नाम प्रिंट करके उनके इस योगदान के विषय में अन्य लोगों को बताकर देहदान करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास करेगा. आपको सनद रहे "शकुंतला प्रेस ऑफ़ इण्डिया प्रकाशन" परिवार पहले भी नेत्रदान करवाने में और देश व समाजहित के कार्यों में बढ़-चढ़कर अपना सहयोग करता रहा है. 

देहदान या अंगदान करने के इच्छुक दानी व्यक्ति फॉर्म निम्नलिखित पर क्लिक करके डाउनलोड कर सकता है. 


Regarding by
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, श्री लालबहादुर शास्त्री व महात्मा गांधी जैसे सिध्दांतों वाले निष्पक्ष, निडर, आज़ाद विचार, अपराध विरोधी, स्वतंत्र पत्रकार, कवि और लेखक रमेश कुमार जैन उर्फ़ निर्भीक (आरटीआई कार्यकर्त्ता और प्रधान संपादक-जीवन का लक्ष्य, शकुन्तला टाइम्स, उत्तम बाज़ार) चुनाव चिन्ह (कैमरा)  के  पूर्व प्रत्याशी-उत्तमनगर विधानसभा 2008 व 2013 और दिल्ली नगर निगम 2007 व 2012 (वार्ड नं. 127 व 128) 
सम्पर्क सूत्र : 9910350461 With Whatsapp , 9868262751, 011-28563826  
ईमेल आई डी : sirfiraa@gmail.com 
 पत्रकार रमेश कुमार निर्भीक पर क्लिक करके हमसे फेसबुक पर मिलिए. 

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आदरणीय शिखा कौशिक जी, मुझे जानकारी नहीं थीं कि सुश्री शालिनी कौशिक जी, अविवाहित है. यह सब जानकारी के अभाव में और भूलवश ही हुआ.क्योकि लगभग सभी ने आधी-अधूरी जानकारी अपने ब्लोगों पर डाल रखी है. फिर गलती तो गलती होती है.भूलवश "श्रीमती" के लिखने किसी प्रकार से उनके दिल को कोई ठेस लगी हो और किसी भी प्रकार से आहत हुई हो. इसके लिए मुझे खेद है.मुआवजा नहीं देने के लिए है.अगर कहो तो एक जैन धर्म का व्रत 3 अगस्त का उनके नाम से कर दूँ. इस अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.

मेरे बड़े भाई श्री हरीश सिंह जी, आप अगर चाहते थें कि-मैं प्रचारक पद के लिए उपयुक्त हूँ और मैं यह दायित्व आप ग्रहण कर लूँ तब आपको मेरी पोस्ट नहीं निकालनी चाहिए थी और उसके नीचे ही टिप्पणी के रूप में या ईमेल और फोन करके बताते.यह व्यक्तिगत रूप से का क्या चक्कर है. आपको मेरा दायित्व सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए था.जो कहा था उस पर आज भी कायम और अटल हूँ.मैंने "थूककर चाटना नहीं सीखा है.मेरा नाम जल्दी से जल्दी "सहयोगी" की सूची में से हटा दिया जाए.जो कह दिया उसको पत्थर की लकीर बना दिया.अगर आप चाहे तो मेरी यह टिप्पणी क्या सारी हटा सकते है.ब्लॉग या अखबार के मलिक के उपर होता है.वो न्याय की बात प्रिंट करता है या अन्याय की. एक बार फिर भूलवश "श्रीमती" लिखने के लिए क्षमा चाहता हूँ.सिर्फ इसका उद्देश्य उनको सम्मान देना था.
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