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सोमवार, जनवरी 30, 2017

हमारे जीवन का दर्शन ( दिसम्बर-2015 )

1 दिसम्बर 2015 : मोहजीत अपनी देह से भी नष्टो मोहा होते हैं.

2 दिसम्बर 2015 : कथनी और करनी में समरूपता रखना ही महान आत्मा का लक्षण है.

3 दिसम्बर 2015 : सच्ची सेवा वह है जिसमें सर्व की दुआओं के साथ ख़ुशी की अनुभूति हो.

4 दिसम्बर 2015 : ईश्वर से बुध्दि की लगन लगाना ही ईश्वर का सहारा लेना है. 

5 दिसम्बर 2015 : अपनी सूक्ष्म कमजोरियों का चिन्तन करके उन्हें मिटा देना ही स्व-चिंतन है.

6 दिसम्बर 2015 : ध्यान रहे ऐसा कोई कर्म न हो जो कुल का दीपक बुझ जाये.

7 दिसम्बर 2015 : सुनने-सुनाने में भावना और भाव को बदल देना भी वायुमंडल खराब करना है.

8 दिसम्बर 2015 : आपस में एक दो की विशेषताओं का वर्णन करो, कमियों का नहीं.

9 दिसम्बर 2015 : देश और समाज की सभी समस्याओं का हल है पवित्रता.

10 दिसम्बर 2015 : सम्पूर्ण अहिंसा अर्थात् संकल्प द्वारा भी किसी को दुःख न देना. 

11 दिसम्बर 2015 : सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण अहिंसा है.

12 दिसम्बर 2015 : किसी पर कुदृष्टि रखना भी पाप है, इसलिए आँखों को शीतल बनाओ.

13 दिसम्बर 2015 : काम महाशत्रु है, इस पर जीत पाने से जगतजीत बनेंगे.

14 दिसम्बर 2015 : ब्रह्मचर्य ही परमात्मा के समीप जाने का साधन है.

15 दिसम्बर 2015 : अपनी गलती दूसरे पर लगाना यह भी पर-चिन्तन है.  

16 दिसम्बर 2015 : मुशिकलों को प्रभु अर्पण कर दो तो हर मुश्किल सहज हो जायेगी.

17 दिसम्बर 2015 : विपत्तियों को सहने का बल केवल ईश्वर की याद से ही मिलता है.

18 दिसम्बर 2015 : जीवन का सच्चा विश्राम आत्म अनुभूति में है.

19 दिसम्बर 2015 : दूसरों के अवगुण न देखना ही सबसे बड़ा त्याग है.

20 दिसम्बर 2015 : कल्याण भावना रखने से दृष्टि और वृत्ति दोनों बदल जाती है.

2दिसम्बर 2015 : आत्मा का परमात्मा से मिलन ही सर्वश्रेष्ट मिलन है. 

22 दिसम्बर 2015 : ईश्वर की स्मृति से ही हम सद्गति प्राप्त कर सकते हैं. 

23 दिसम्बर 2015 : अब भगवान से फरियाद करने के बजाय उसे याद करो. 

24 दिसम्बर 2015 : चिंता छोड़ प्रभु चिन्तन करो.

25 दिसम्बर 2015 : संसार में भंयकर तूफान-आंधी के समय एक भगवान ही श्रेष्ट रक्षक है. 

26 दिसम्बर 2015 : दूसरों के दोष न देखो, अपने अंदर के दोष देखो तो निर्दोष बन जायेंगे. 

27 दिसम्बर 2015 : स्वभाव को सरल बनाओ तो समय व्यर्थ नहीं जायेगा. 

28 दिसम्बर 2015 : दूसरों को गुणों के आधार पर आगे रखना भी अपने को आगे बढ़ाना है.

29 दिसम्बर 2015 : जो सदा संतुष्ट है, वही सदा हर्षित एवं आकर्षणमूर्त है.

30 दिसम्बर 2015 : व्यर्थ कार्य जीवन को थका देता है, रचनात्मक कार्य सुख और तेजस्विता बढ़ा देता है.

31 दिसम्बर 2015 : जो सदा प्रसन्न रहता है उसके अंदर आलस्य नहीं हो सकता है, आलस्य सबसे बड़ा दुर्गुण है. 

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यह है मेरे सच्चे हितेषी (इनको मेरी आलोचना करने के लिए धन्यवाद देता हूँ और लगातार आलोचना करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद करता हूँ)
पाठकों और दोस्तों मुझसे एक छोटी-सी गलती हुई है.जिसकी सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगता हूँ. अधिक जानकारी के लिए "भारतीय ब्लॉग समाचार" पर जाएँ और थोड़ा-सा ध्यान इसी गलती को लेकर मेरा नजरिया दो दिन तक "सिरफिरा-आजाद पंछी" पर देखें.

आदरणीय शिखा कौशिक जी, मुझे जानकारी नहीं थीं कि सुश्री शालिनी कौशिक जी, अविवाहित है. यह सब जानकारी के अभाव में और भूलवश ही हुआ.क्योकि लगभग सभी ने आधी-अधूरी जानकारी अपने ब्लोगों पर डाल रखी है. फिर गलती तो गलती होती है.भूलवश "श्रीमती" के लिखने किसी प्रकार से उनके दिल को कोई ठेस लगी हो और किसी भी प्रकार से आहत हुई हो. इसके लिए मुझे खेद है.मुआवजा नहीं देने के लिए है.अगर कहो तो एक जैन धर्म का व्रत 3 अगस्त का उनके नाम से कर दूँ. इस अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.

मेरे बड़े भाई श्री हरीश सिंह जी, आप अगर चाहते थें कि-मैं प्रचारक पद के लिए उपयुक्त हूँ और मैं यह दायित्व आप ग्रहण कर लूँ तब आपको मेरी पोस्ट नहीं निकालनी चाहिए थी और उसके नीचे ही टिप्पणी के रूप में या ईमेल और फोन करके बताते.यह व्यक्तिगत रूप से का क्या चक्कर है. आपको मेरा दायित्व सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए था.जो कहा था उस पर आज भी कायम और अटल हूँ.मैंने "थूककर चाटना नहीं सीखा है.मेरा नाम जल्दी से जल्दी "सहयोगी" की सूची में से हटा दिया जाए.जो कह दिया उसको पत्थर की लकीर बना दिया.अगर आप चाहे तो मेरी यह टिप्पणी क्या सारी हटा सकते है.ब्लॉग या अखबार के मलिक के उपर होता है.वो न्याय की बात प्रिंट करता है या अन्याय की. एक बार फिर भूलवश "श्रीमती" लिखने के लिए क्षमा चाहता हूँ.सिर्फ इसका उद्देश्य उनको सम्मान देना था.
कृपया ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिंक देखे. पूरी बात को समझने के लिए http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html,
गलती की सूचना मिलने पर हमारी प्रतिक्रिया: http://blogkeshari.blogspot.com/2011/07/blog-post_4919.html

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