गुस्ताखी माफ़ करें
गुस्ताखी माफ़ करें-अब कैमरा
ऐसी फोटो नहीं लें पायेगा
हिंदी साहित्य निकेतन,हिन्दी ब्लॉगिंग में सिरमौर रवीन्द्र प्रभात और अविनाश वाचस्पति का सामूहिक श्रम. शनिवार दिनांक 30 अप्रैल 2011 को हिंदी भवन दिल्ली में हिन्दी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए यह कार्यक्रम अध्यक्षता हास्य व्यंग्य के सशक्त और लोकप्रिय हस्ताक्षर अशोक चक्रधर ने की। इस अवसर पर मुख्य अतिथि रहे वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र और विशिष्ट अतिथि रहे प्रभाकर श्रोत्रिय। साथ ही प्रमुख समाजसेवी विश्वबंधु गुप्ता और डायमंड बुक्स के संचालक नरेन्द्र कुमार वर्मा भी मंचासीन थे।
इस अवसर पर प्रमुख समाजसेवी विश्वबंधु गुप्ता ने कहा कि जीवन के उद्देश्य ऐसे होने चाहिए कि जिसमें मानवीय सेवा निहित हो। मैं ब्लॉगिंग के बारे में बहुत ज्यादा तो नहीं जानता किंतु जहां तक मेरी जानकारी में है और मैंने महसूस किया है, उसके आधार पर यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हिंदी ब्लॉगिंग में सामाजिक स्वर और सरोकार पूरी तरह दिखाई दे रहा है। कई ऐसे ब्लॉगर हैं जो सामाजिक जनचेतना को हिंदी ब्लॉगिंग से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। यह दुनिया विचारों की दुनिया है, बस कोशिश यह करें कि हमारे विचार आम आदमी से जुड़कर आगे आएं.
मैं वैसे पत्रकारों के सम्मेलन आदि जाता नहीं हूँ क्योंकि वहां पर वहीँ तीन-चार बातों को बोला जाता जो कोई पत्रकार अपने जीवन में अपनाकर गरीबी या भौतिक वस्तुओं के अभाव में जीना नहीं चाहता है. उपरोक्त कार्यक्रम में भी प्रमुख समाजसेवी विश्वबंधु गुप्ता ने जो कहा उसको एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकालकर अपने-अपने रास्ते पर चल दिए और आज किसी को उनकी एकाध बात याद भी नहीं होगी. अगर होगी भी तो उसपर अमल करने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. चलिए कोई बात नहीं. कुछ खाकर व कुछ बिना खाए लौट गए.
इसके बाद उपरोक्त कार्यक्रम को लेकर एक से एक पोस्ट आई. किसी पोस्ट में आलोचना और किसी में तारीफ के पुल बाँध गए. कहीं-कहीं पर पोस्ट में हंसी-मजाक के साथ-साथ गंभीर बातें तक की गई. कुछ इन्हीं बातों का समावेश लिये लिंक दे रहा हूँ. जो किसी करणवश नहीं पहुँच पाए हो या किसी पोस्ट की जानकारी न होने के कारण जाने से वंचित रह गए हो.
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अरे भाई आगे से हटो हमें फोटो खींचने के लिए नहीं बुलाया क्या?
वहां पर श्री अविनाश जी से विवादित फोटो को लेकर भी जिक्र किया था. जिसकी पिछले दिनों ब्लॉग पर बहुत चर्चा हुई थीं. जवाब कोई तर्क पूवर्क नहीं था. ईनामों को लेकर भी बंदर -बाँट हुई है और वहां पर मौजूद कई ब्लॉगर विरोध जता रहे थें. कई ब्लॉगर विरोध के कारण ही दावत (खाना) खाए बगैर ही चले गए थें. करते ब्लोगगिरी और नाम गुप्त रखने का हमसे वादा लेते हैं आखिर क्यों करते हैं इतना दोगलापन? यह कोई समाचार पत्र नहीं है कि विज्ञापन नहीं मिले तो पत्र नहीं छपेगा ब्लॉग लिखने में केवल इन्टरनेट का ही खर्चा आता है या विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे थें अगली बार उनको भी ईनाम देकर चुप करा दिया जाए. मुझे उपरोक्त कार्यक्रम की कोई सूचना नहीं थी .बल्कि अपनी समस्याओं के चलते कुछ लोगों से मिलना जरुरी था. किसी से कुछ न कुछ जानकारी लेनी थीं .किसी से ब्लॉग के बारे में तकनीकी और किसी से अपने केसों को लेकर क़ानूनी दांव -पेजों की छोटी -छोटी जानकारी. छोटी -छोटी गलतियों को छोड़कर कार्यक्रम अच्छा था. थियेटर के कलाकारों ने बहुत अच्छा एक उपन्यास की कहानी पर आधरित एक नाटक का बहुत सुन्दर मंचन किया था मैं अनेकों ब्लोगरों के नाम नहीं जानता और कई को चेहरों पर मुखोटे थें और कई का नाम मेरा फर्ज गवाही नहीं दे रहा है . |
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जल्दी से किताब देखने दो मीडिया को कहीं चली न जाये |
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भाई लोगों हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो हमारी फोटो बिगड़ दी |
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मुझे इनाम जल्दी से दो बेशक काजल कुमार ही दे दो. घर जल्दी जाना है |
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बेटा तुमको अपनी फोटो नहीं खिंचवानी है तो हमारी फोटो तो लेने दो. |
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अच्छी तरह से देखभाल लेना भाई अपना ईनाम. जरा मैं भी अपना चश्मा ठीक कर लूँ. |
यह है मेरे सच्चे हितेषी (इनको मेरी आलोचना करने के लिए धन्यवाद देता हूँ और लगातार आलोचना करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद करता हूँ)
पाठकों और दोस्तों मुझसे एक छोटी-सी गलती हुई है.जिसकी सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगता हूँ. अधिक जानकारी के लिए "भारतीय ब्लॉग समाचार" पर जाएँ और थोड़ा-सा ध्यान इसी गलती को लेकर मेरा नजरिया दो दिन तक "सिरफिरा-आजाद पंछी" पर देखें.आदरणीय शिखा कौशिक जी, मुझे जानकारी नहीं थीं कि सुश्री शालिनी कौशिक जी, अविवाहित है. यह सब जानकारी के अभाव में और भूलवश ही हुआ.क्योकि लगभग सभी ने आधी-अधूरी जानकारी अपने ब्लोगों पर डाल रखी है. फिर गलती तो गलती होती है.भूलवश "श्रीमती" के लिखने किसी प्रकार से उनके दिल को कोई ठेस लगी हो और किसी भी प्रकार से आहत हुई हो. इसके लिए मुझे खेद है.मुआवजा नहीं देने के लिए है.अगर कहो तो एक जैन धर्म का व्रत 3 अगस्त का उनके नाम से कर दूँ. इस अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ. मेरे बड़े भाई श्री हरीश सिंह जी, आप अगर चाहते थें कि-मैं प्रचारक पद के लिए उपयुक्त हूँ और मैं यह दायित्व आप ग्रहण कर लूँ तब आपको मेरी पोस्ट नहीं निकालनी चाहिए थी और उसके नीचे ही टिप्पणी के रूप में या ईमेल और फोन करके बताते.यह व्यक्तिगत रूप से का क्या चक्कर है. आपको मेरा दायित्व सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए था.जो कहा था उस पर आज भी कायम और अटल हूँ.मैंने "थूककर चाटना नहीं सीखा है.मेरा नाम जल्दी से जल्दी "सहयोगी" की सूची में से हटा दिया जाए.जो कह दिया उसको पत्थर की लकीर बना दिया.अगर आप चाहे तो मेरी यह टिप्पणी क्या सारी हटा सकते है.ब्लॉग या अखबार के मलिक के उपर होता है.वो न्याय की बात प्रिंट करता है या अन्याय की. एक बार फिर भूलवश "श्रीमती" लिखने के लिए क्षमा चाहता हूँ.सिर्फ इसका उद्देश्य उनको सम्मान देना था.कृपया ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिंक देखे. पूरी बात को समझने के लिए http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html, गलती की सूचना मिलने पर हमारी प्रतिक्रिया: http://blogkeshari.blogspot.com/2011/07/blog-post_4919.html
एक अलग तरह की रिपोर्ट।
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