ब्लॉग राजभाषा हिंदी की पोस्ट "परिकल्पना सम्मान 2010 और एक बैक बेंचर ब्लोगर की रिपोर्ट" पर श्री अविनाश वाचस्पति जी, आपने कहा कि-निकेतन ने अपने प्रकाशन की एक एक प्रति प्रत्येक दर्शक को बतौर उपहार दी थी और अपनी पत्रिका शोध दिशा की प्रति भी। किसी भी समारोह में इस प्रकार की पुस्तकें फ्री में देने का चलन नहीं है। शोध दिशा का पुराना अंक (अक्तूबर-दिसंबर 2010) था. उसका अवलोकन करने पर पता चला कि-पत्रिका त्रेमासिक है और उसके बाद जनवरी-मार्च 2011 व अप्रैल-जून 2011 भी प्रकाशित हो चुकी हैं. इसके अलावा डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा "अरुण" की ग़ज़लों वाली किताब "बहती नदी हो जाइए" भी 2006 में प्रकाशित हो चुकी थीं. अब पुराना माल तो कोई भी दे सकता है, कुछ थोड़ा-बहुत नया मिला भी तो "वटवृक्ष" त्रेमासिक पत्रिका है,वो उनकी नहीं है.
हम ब्लोगिंग जगत के "अजन्मे बच्चे" हैं और ब्लोगिंग जगत की गुटबाजी के जानकार भी नहीं है, लेकिन ब्लोगिंग जगत का अनपढ़, ग्वार यह नाचीज़ इंसान प्यार, प्रेम और इंसानियत की अच्छी भावना के चलते एक ब्लॉगर के बुलाने(आपके अनुसार बिन बुलाये) चला आया था. वैसे मेरे पेशेगत गलत भी नहीं था, क्योंकि जहाँ कहीं चार-पांच व्यक्ति एकत्रित होकर देश व समाजहित में कोई चर्चा करें. तब वहां बगैर बुलाये जाना बुरा नहीं होता है. बाकी हमारा तो गरीबी में आटा गिला हो गया है. इन दिनों कुछ निजी कारणों से हमें भूलने की बीमारी है और उसी के चलते ही हम अपने डिजिटल कैमरे के एक सैट सैल(दो) और उसका चार्जर बिजली के प्लग में लगाये ही भूल आये क्योंकि हमें संपूर्ण कार्यक्रम की रुपरेखा की जानकारी नहीं थीं. हमने सोचा शायद कार्यक्रम अभी और चलने वाला है. तब क्यों नहीं "विक" सैलों को चार्जर कर लिया जाये. घर पहुंचकर याद आया तो आपको मैसेज किया और अगले दिन आपके 9868xxxxxx पर छह बार और 9717xxxxxx पर दो बार फ़ोन किया. मगर हमारी उम्मीदों के मोती बरसात के बुलबलों की तरह तुरंत खत्म हो गए.एक फ़ोन कई घंटों तक व्यस्त रहा और दूसरा रिसीव नहीं हुआ. अगले दिन हमें श्री अन्ना हजारे के इण्डिया गेट की कवरेज करने जाना था. जो उम्मीदों का टूटने का सदमा सहन नहीं कर पाने और सैल का सैट के साथ चार्जर तुरंत न खरीद(इन दिनों आर्थिक स्थिति डावाडोल है) पाने की व्यवस्था के चलते संभव नहीं हो पाया. अब यह तो पता नहीं कि-हमारा कैमरा कब दुबारा चित्र लेना शुरू करेगा, मगर उसकी कुछ "गुस्ताखी माफ़ करें" अनेक ब्लोगों पर उपरोक्त कार्यक्रम की अनेकों फोटोग्राफ्स प्रकाशित हो चुकी है. लेकिन मेरे पास कुछ ऐसी फोटो तैयार हो गई है. जो किसी का अचानक हाथ लगने से या किसी द्वारा अचानक आँखें बंद कर लेने से और कई अजब-गजब फोटो कुछ अन्य कारणों से तैयार हो गई है. आप देखने से पहले श्री अशोक चक्रधर की "कैमरा" पर लिखी एक कविता "कैमरा देव की आरती"भी पढ़ लें.
जय हो कैमरा देव की, शक्ति तुम्हीं हो सत्यमेव की. जय जय हो ....
दुनियां झूठी पर तुम सच्चे, पूजा करते हम सब बच्चे .
तुम्हें देखते ही जाने क्यों पानी मांगें अच्छे-अच्छे.
सन्मुख आया, लेकिन पहले, हीरो ने छ: बार शेव की. जय जय हो ....
तुम्हीं मीडिया के टायर हो, तुम्ही तीसरे अम्पायर हो.
पल में पोल खोलने वाले, ईश्वर हो तुम इन्क्वायर हो.
सत्य दिखाकर न्यायालय में, कितनों की जिन्दगी सेव की.जय जय हो ....
तुम चाहो तो वंडर कर दो, नाली बीच समन्दर कर दो.
सुंदर को बन्दर सा करके, बदसूरत को सुंदर कर दो.
अगर खींचने पर आ जाओ, भद्र्द पीट दो कामदेव की . जय जय हो ....
तुमने सारी दुनियां नपी, तुमने जी की बातें भांपी.
अच्छे-अच्छे पहलवान की, तुम्हारे आगे टाँगें कांपी.\
मुख पर आये पसीना लेकिन, फिलिंग होती कोल्ड वेव की. जय जय हो ....
फूल चढ़ाऊँ खील चढ़ाऊँ, दिया जला कंदील चढ़ाऊँ.
जितना चाहे उतना खींचों, टेप चढ़ाऊँ, रील चढ़ाऊँ.
खुले पिटारा, हो उध्दारा, स्वीकारो अरदास स्लेव की.जय जय हो ....
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भाई मैंने तम्हारा क्या बिगाड़ा था जो मेरा चहेरा बिगड़ दिया यह कहते हुए श्री अविनास जी |
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लो श्रीमान जी एक अच्छी सी फोटो कभी-कभी कैमरा भी धोखा दे जाता है. |
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अल्लाह बचाए इन कैमरे वालों से फोटो के नाम पर मजाक ज्यादा करते हैं. |
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अब मुझे फोटो खिंचवाने का शौक नहीं रहा मेरी बेटी की शादी जो हो गई है. |
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मैं तो हाथ नहीं मिलना चाहता था,मगर देखो खुद मुख्यमंत्री जी ने हाथ मिलाया है. |
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कई दिनों से भागदौड़ बहुत हो रही है, भाई जरा थोड़ी देर खड़े-खड़े ही सो लेने दो. |
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इतने लोगों को इनाम बांटते-बांटते थक गया हूँ, थोडा आराम तो करने देते मेरे भाई. थोडा सो लेने के बाद ही कुछ बोलूँगा. |
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शाहनवाज सिद्दीकी- श्री दिनेश राय द्विवेदी जी, आज आपको एक कमाल दिखता हूँ-देखो मैं आँखे बंद करके भी मोबाईल के नं. मिला लेता हूँ. श्री दिनेश राय द्विवेदी जी-शाहनवाज सिद्दीकी, अच्छा! मुझसे तो नहीं होता है. |
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कवि श्री अशोक चक्रधर जी भी श्री अविनास जी को आँखे बंद करके भी मोबाईल के नं. मिलाने की अपनी कला से अवगत करते हुए और यह बताते हुए कि-हम किसी से कम नहीं है. |
ये क्या इत्ता बड़ा फोटो कम्प्यूटर के फ्रेम से बाहर जा रहा है।
जवाब देंहटाएंबहुत दिनो बाद आयी हूँ मुझ से वादा किया था कि मेरा फोतो भेजोगे मगर भूल गयी शायद मै भी इस ब्लाग पर आना भूल गयी थी। शुभकामनायें\ कुछ वायदे ऐसे प्रोग्रामों मे खर्चा पाणी चलाने के लिये भी किये जाते हैं, जायज़ है, भाई नया पुरान कुछ भी हो\
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंसुन्दर और गजब के आप के टिपण्णी के साथ
जवाब देंहटाएंbadhiya hai :)
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा.....
जवाब देंहटाएंबधाई....
आपकी जितनी तारीफ की जाए कम है
जवाब देंहटाएंबढिया,
जवाब देंहटाएंआपको बधाई