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गुरुवार, अगस्त 25, 2011

माफ़ी मांग लेने के बाद क्या मामला खत्म समझ लेना चाहिए?

 श्री मनीष तिवारी के माफ़ी मांग लेने के बाद क्या यह मामला खत्म समझ लेना चाहिए? एक शर्त पर उसे रामलीला मैदान में जाकर श्री अन्ना हजारे जी के पांव पकडकर माफ़ी मागनी चाहिए, वर्ना यह माफ़ी के काबिल नहीं, क्योंकि जिस ढंग से बोला था, उसमें अहंकार दिखता था कुर्सी का, जब मनीष तिवारी श्री अन्ना हजारे जी जैसे महान आदमी के विरुध्द् ऎसा बोलता है. तब हम‍‍ तुम जैसे के संग कैसे बोलता होगा? इसलिए इन‌का अंहकार जरुर तोडना चाहियॆ, जाये और‌ अन्ना के पांव पकड कर माफ़ी मांगे, फ़िर श्री अन्ना जी की मर्जी माफ़ करें या नहीं.
 
श्री मनीष तिवारी जी, मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ कि आपने कौन से स्कूल में पढाई की है और किस मास्टर ने आपको पढाया है कि अपने से 28 साल बड़े व्यक्ति को "तुम" कहना चाहिए? बल्कि आयु में इतने बड़े व्यक्ति को "पिता" तुल्य समझा जाता है.मै मानता हूँ कि राजनीति में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगया जाता हूँ. क्या आपके माता‍‍ पिता ने आपको इतने भी संस्कार नहीं दिए? बल्कि आप स्वयं ब्राहमण कुल परिवार से हो फिर पता नहीं आपने इतनी बड़ी गलती कैसे कर बैठे और फिर माफ़ी मांगने में भी ग्यारह दिन लगा दिए.

4 टिप्‍पणियां:

  1. माफी तो आम जनता से भी मांगनी चाहिए...दिल तो सभी का दुखा है।

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  2. सही बात कही है आपने पर ये लोग सुनते कब है?
    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

    उत्तर देंहटाएं

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यह है मेरे सच्चे हितेषी (इनको मेरी आलोचना करने के लिए धन्यवाद देता हूँ और लगातार आलोचना करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद करता हूँ)
पाठकों और दोस्तों मुझसे एक छोटी-सी गलती हुई है.जिसकी सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगता हूँ. अधिक जानकारी के लिए "भारतीय ब्लॉग समाचार" पर जाएँ और थोड़ा-सा ध्यान इसी गलती को लेकर मेरा नजरिया दो दिन तक "सिरफिरा-आजाद पंछी" पर देखें.

आदरणीय शिखा कौशिक जी, मुझे जानकारी नहीं थीं कि सुश्री शालिनी कौशिक जी, अविवाहित है. यह सब जानकारी के अभाव में और भूलवश ही हुआ.क्योकि लगभग सभी ने आधी-अधूरी जानकारी अपने ब्लोगों पर डाल रखी है. फिर गलती तो गलती होती है.भूलवश "श्रीमती" के लिखने किसी प्रकार से उनके दिल को कोई ठेस लगी हो और किसी भी प्रकार से आहत हुई हो. इसके लिए मुझे खेद है.मुआवजा नहीं देने के लिए है.अगर कहो तो एक जैन धर्म का व्रत 3 अगस्त का उनके नाम से कर दूँ. इस अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.

मेरे बड़े भाई श्री हरीश सिंह जी, आप अगर चाहते थें कि-मैं प्रचारक पद के लिए उपयुक्त हूँ और मैं यह दायित्व आप ग्रहण कर लूँ तब आपको मेरी पोस्ट नहीं निकालनी चाहिए थी और उसके नीचे ही टिप्पणी के रूप में या ईमेल और फोन करके बताते.यह व्यक्तिगत रूप से का क्या चक्कर है. आपको मेरा दायित्व सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए था.जो कहा था उस पर आज भी कायम और अटल हूँ.मैंने "थूककर चाटना नहीं सीखा है.मेरा नाम जल्दी से जल्दी "सहयोगी" की सूची में से हटा दिया जाए.जो कह दिया उसको पत्थर की लकीर बना दिया.अगर आप चाहे तो मेरी यह टिप्पणी क्या सारी हटा सकते है.ब्लॉग या अखबार के मलिक के उपर होता है.वो न्याय की बात प्रिंट करता है या अन्याय की. एक बार फिर भूलवश "श्रीमती" लिखने के लिए क्षमा चाहता हूँ.सिर्फ इसका उद्देश्य उनको सम्मान देना था.
कृपया ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिंक देखे. पूरी बात को समझने के लिए http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html,
गलती की सूचना मिलने पर हमारी प्रतिक्रिया: http://blogkeshari.blogspot.com/2011/07/blog-post_4919.html

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