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मंगलवार, अप्रैल 02, 2013

रूपये के प्रतीक चिह्न पर खेला गया खेल (नया घोटला)

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रुपये के बहुचर्चित नए प्रतीक के पीछे भ्रष्टाचार का एक कम चर्चित पक्ष भी है और एक बिल्कुल ही नई किस्म का यह भ्रष्टाचार सिर्फ रुपये के प्रतीक तक ही सीमित नहीं है.
'भारतीय रुपये के प्रतीक चिह्न का निर्माता कौन है?'- सामान्य ज्ञान की किताबों से लेकर कई प्रतियोगिताओं और परीक्षाओं में आपका भी सामना शायद इस सवाल से हो चुका होगा. यदि आपने इस प्रश्न का जवाब 'डी उदया कुमार' दिया होगा तो आपको पूरे अंक भी मिले होंगे. लेकिन यदि आपको यह बताया जाए कि यह चिह्न तो उदया कुमार से बहुत पहले ही किसी दूसरे व्यक्ति ने बना लिया था तो क्या तब भी आप मानेंगे कि इस प्रश्न का सही जवाब उदया कुमार ही होना चाहिए?
वैसे इस तथ्य को महज एक संयोग समझकर आप मान भी सकते हैं कि सही जवाब तो डी उदया कुमार ही होना चाहिए. लेकिन जिस शख्स ने यह चिह्न उदया कुमार से बहुत पहले बनाया था उसने इसे अपने तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक और प्रधानमंत्री कार्यालय को एक सुझाव पत्र के साथ भेजा भी था. इस सुझाव पत्र में इस शख्स ने कहा था कि अब भारतीय रुपये का भी कोई प्रतीक चिह्न होना चाहिए जिसके लिए उसके द्वारा बनाए गए चिह्न पर विचार किया जा सकता है. प्रधानमंत्री कार्यालय से यह सुझाव पत्र वित्त मंत्रालय भेजा गया और इस तरह से सरकारी महकमा इस चिह्न से कई साल पहले ही परिचित हो चुका था. फिर एक प्रतियोगिता आयोजित करवाई गई और डी उदया कुमार वही चिह्न प्रस्तुत करके विजेता बन गए. लेकिन इस प्रतियोगिता के लिए उदया कुमार एक अयोग्य प्रतिभागी थे. वे डीएमके के पूर्व विधायक श्री धर्मलिंगम के पुत्र हैं और जब यह प्रतियोगिता करवाई गई थी उस दौरान डीएमके भी केंद्र सरकार का एक हिस्सा थी. वैसे उनकी अयोग्यता का कारण यह नहीं कि वे एक पूर्व विधायक के पुत्र हैं बल्कि यह है कि उन्होंने प्रतियोगिता की शर्तों का उल्लंघन किया था जिस कारण वे प्रतियोगिता हेतु अयोग्य हो चुके थे. इन तथ्यों को जानने के बाद भी क्या आप मानेंगे कि इस ऐतिहासिक महत्व के प्रश्न का 'सही जवाब' डी उदया कुमार ही होना चाहिए?
प्रतीक, प्रतियोगिता और प्रश्न
  • प्रतियोगिता के नियम और शर्तें सिर्फ अंग्रेजी में जारी हुए जो राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन है 
  • चयन के लिए बनी जूरी के सभी सदस्य प्रतियोगिता के दौरान एक बार भी एक साथ नहीं बैठे
    प्रतिभागियों द्वारा प्रतीक चिह्न के साथ जमा की गई स्क्रिप्ट जूरी के सामने पेश ही नहीं की गई
  • एक प्रतिभागी दो ही चिह्न जमा कर सकता था, पर विजेता डी उदयाकुमार ने एक बयान में कई चिह्न जमा करने की बात कही. कायदे से उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए था
  • प्रतीक चिह्न राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े तो होते ही हैं, वे अरबों रुपये के व्यापार को भी प्रभावित करते हैं. इसलिए कुछ व्यापारिक कंपनियों के भी इस गड़बड़झाले में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं
  • ऐसी गड़बड़ियां दूसरे प्रतीक चिह्नों के चयन में भी हुई हैं
दरअसल रुपये का प्रतीक चिह्न चुनने के लिए भारत सरकार द्वारा 2009 में एक प्रतियोगिता आयोजित करवाई गई थी. इस प्रतियोगिता का परिणाम 15 जुलाई, 2010 को घोषित हुआ और रुपये को उसकी नई पहचान मिल गई. देश के करोड़ों लोगों ने इस बात पर गर्व किया कि अब रुपया भी दुनिया की सबसे मजबूत मुद्राओं यानी डॉलर, यूरो और येन की श्रेणी में आ खड़ा हुआ है. इसके साथ ही देश के इतिहास में इस चिह्न को बनाने वाले का नाम भी हमेशा के लिए अमर हो गया.  लेकिन तहलका को मिले दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय महत्व की यह प्रतियोगिता एक औपचारिकता मात्र थी जो सिर्फ लोगों को भ्रमित करने के लिए आयोजित की गई थी. जिस तरह से इस प्रतियोगिता की प्रक्रिया संपन्न हुई, उससे यह भी संकेत मिलता है कि सरकार पहले ही यह मन बना चुकी थी कि भारतीय रुपये का प्रतीक चिह्न क्या होगा.
रुपये के प्रतीक चिह्न के बारे में अधिकतर लोग बस यही जानते हैं कि इसके निर्धारण के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता आयोजित की गई और इस प्रतियोगिता में सबसे बेहतरीन चिह्न प्रस्तुत करने वाले को विजेता घोषित करते हुए उसके चिह्न को रुपये का प्रतीक बना लिया गया. लेकिन ऐसा नहीं है. इस पूरे मामले में हुई गड़बड़ियों को समझने के लिए इसे उसी क्रम में देखना अनिवार्य हो जाता है जिस क्रम में इन गड़बड़ियों का खुलासा होता चला गया.  फरवरी, 2009 में भारत सरकार द्वारा रुपये का चिह्न चुनने के लिए एक प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा की गई. कई अखबारों और वेबसाइटों पर इस संबंध में विज्ञापन जारी किये गए. विज्ञापन भले ही अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं में जारी किए गए थे लेकिन प्रतियोगिता की शर्तों को सिर्फ अंग्रेजी में जारी किया गया. ऐसा करना राजभाषा अधिनियम का सीधा उल्लंघन था. प्रतियोगिता के विज्ञापन में यह भी लिखा गया था कि यह चिह्न भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को परिलक्षित करता हो, लेकिन प्रतियोगिता के नियम व शर्तों को सिर्फ अंग्रेजी में जारी करके भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को समझने वाले उन तमान लोगों को इसमें हिस्सा लेने से वंचित कर दिया गया जो अंग्रेजी में निपुण नहीं थे. वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किए गए इस विज्ञापन में आवेदन जमा करवाने की अंतिम तिथि 15 अप्रैल, 2009 निर्धारित की गई थी. प्रत्येक आवेदन के साथ 500 रुपये के आवेदन शुल्क की मांग भी की गई थी. देश भर के हजारों नागरिकों ने रुपये का प्रतीक दर्शाती अपनी-अपनी रचनाएं मंत्रालय में जमा करवाईं. प्रतियोगिता आयोजित करने वाले वित्त मंत्रालय के पास इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि कुल कितने आवेदन मंत्रालय को देश भर से प्राप्त हुए. कुछ राष्ट्रीय समाचार पत्रों की मानें तो यह संख्या 25,000 के करीब है. हालांकि सूचना के अधिकार में पूछे जाने पर अधिकारी बताते हैं कि कुल आवेदनों की संख्या का कोई भी ब्योरा मंत्रालय के पास नहीं है, लेकिन मौखिक रूप से गणना करने पर 3,331 आवेदन सही पाए गए थे जिन्हें जूरी के समक्ष प्रस्तुत किया गया.
आवेदनों में से सबसे बेहतरीन चिह्न चुने जाते वक्त जूरी की अध्यक्ष और रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर श्रीमती उषा थोराट अनुपस्थित थीं
प्रतियोगिता में भाग लेने वाले हजारों प्रतिभागी परिणाम घोषित होने की प्रतीक्षा में थे. इन्ही में से एक थे लखनऊ निवासी राकेश कुमार सिंह. सरकारी सेवा में तैनात राकेश बताते हैं, ‘परिणामों के प्रति हमारा उत्सुक होना स्वाभाविक था. आखिर यह एक ऐसी प्रतियोगिता थी जिससे एक ऐतिहासिक फैसला होने वाला था और जो भी इसमें विजेता घोषित होता उसका नाम हमेशा के लिए इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही अमर हो जाता.’ प्रतियोगिता के अंतिम चरण में पांच प्रतिभागियों का चयन होना था जिन्हें  25-25 हजार रुपये का पुरस्कार दिया जाना था और अंतिम विजेता को ढाई लाख का इनाम दिया जाना था. इसी क्रम में आठ दिसंबर, 2009 को अंतिम पांच प्रतिभागियों के नाम वित्त मंत्रालय की वेबसाइट पर घोषित कर दिए गए. इनमें से चार मुंबई से ही थे. विभाग की वेबसाइट पर इनके नाम तो घोषित कर दिए गए थे लेकिन इनके द्वारा प्रस्तुत किए गए चिह्नों को नहीं दर्शाया गया था. प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले अन्य प्रतिभागियों को अपना नाम अंतिम पांच में न पाकर हताशा तो हुई लेकिन उससे ज्यादा उन चिह्नों को देखने की जिज्ञासा हुई जिन्हें अंतिम पांच में चुना गया था. इसी जिज्ञासा के चलते लखनऊ के राकेश कुमार ने सूचना के अधिकार के जरिए वित्त मंत्रालय से इन चिह्नों की प्रतिलिपि मांगी. साथ ही उन्होंने जूरी/चयन समिति के सदस्यों के नाम एवं कुछ अन्य जानकारियां भी मांगीं. देश के कोने-कोने से अन्य लोगों ने भी मंत्रालय से इस बारे में विभिन्न सूचनाएं मांगीं. आवेदनों के जवाब में जो जानकारियां मंत्रालय द्वारा प्रदान की गईं उनसे धीरे-धीरे इस प्रतियोगिता की खामियां सामने आने लगीं.
इस महत्वपूर्ण चिह्न को चुनने के लिए सात लोगों की एक जूरी बनाई गई थी. इस समिति में भारतीय रिजर्व बैंक से लेकर संस्कृति मंत्रालय तक के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया गया था. लेकिन यह जूरी इस राष्ट्रीय चिह्न के चयन को कितनी गंभीरता से ले रही थी इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पूरी चयन प्रक्रिया के दौरान एक बार भी जूरी के सभी सदस्य एक साथ नहीं बैठे. संस्कृति मंत्रालय के प्रतिनिधि तो इस पूरी चयन प्रक्रिया में एक दिन भी उपस्थित नहीं हुए. प्रतियोगिता में हुई गड़बड़ियों को उजागर करने वालों में शामिल रहे मुंबई निवासी अनिल खत्री कहते हैं, ‘संस्कृति मंत्रालय के एक प्रतिनिधि को जूरी में इसलिए शामिल किया गया था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि रुपये का चिह्न भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को भी परिलक्षित करता हो. लेकिन पूरी चयन प्रक्रिया में एक दिन भी संस्कृति मंत्रालय से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ. तो फिर इस बात को किसने सुनिश्चित किया कि हजारों आवेदनों में से यही चिह्न भारतीय संस्कृति का सबसे बेहतर परिचायक है?’ चयन प्रक्रिया का पहला चरण 29 और 30 सितंबर को आयोजित किया गया. इस पहले और मुख्य दौर में जब कुल आवेदनों में से सबसे बेहतरीन चिह्नों को चुना जाना था तो जूरी के सात में से तीन सदस्य उपस्थित ही नहीं थे. इनमें जूरी की अध्यक्ष और रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर श्रीमती उषा थोराट भी शामिल थीं. जूरी के जो सदस्य उपस्थित थे उन्होंने भी यह चयन प्रक्रिया टालने वाले अंदाज में पूरी की. इन दो दिन में जूरी ने सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक काम किया. इस दौरान जूरी द्वारा कुल 3,331 चिह्नों का अवलोकन किया गया. विज्ञापन के अनुसार प्रत्येक चिह्न को विभिन्न आकारों में जमा करवाना था जिनमें सबसे छोटा आकार '4 पॉइंट फॉन्ट' में होना अनिवार्य था. इस तरह से प्रत्येक चिह्न का अवलोकन करने के लिए काफी ध्यान दिए जाने की जरूरत थी.
नोंदिता कोरिया द्वारा जो प्रतीक 2005 में रिजर्व बैंक को भेजा गया था वह बिल्कुल वही था जिसे आज हम रुपये के प्रतीक के तौर पर पहचानते हैं
लेकिन जूरी ने जितना समय इन आवेदनों के अवलोकन में बिताया उसका यदि औसत देखा जाए तो मात्र 16 सेकंड में जूरी द्वारा प्रत्येक चिह्न का अवलोकन कर लिया गया. राकेश कुमार कहते हैं, ‘दुनिया का विद्वान से विद्वान व्यक्ति भी 16 सेकंड में किसी चिह्न का अवलोकन करके उसे समझ नहीं सकता. यह चिह्न तो देश का भविष्य होने वाला था, राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक बनने वाला था. इतने महत्वपूर्ण चिह्न को जूरी द्वारा चुटकी बजाते ही चुन लिया गया. क्या दुनिया का कोई भी व्यक्ति कुछ सेकंड में ही किसी चिह्न को देखकर यह तय कर सकता है कि कैसे वह भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को परिलक्षित करता है?’
प्रत्येक आवेदन के साथ ही प्रतिभागियों को चिह्न से संबंधित स्क्रिप्ट भी लिखित रूप में जमा करवानी थी. इस स्क्रिप्ट में प्रत्येक प्रतिभागी को अपने चिह्न की व्याख्या करते हुए यह बताना था कि कैसे वह चिह्न भारत में रुपए का प्रतीक हो सकता है और कैसे वह भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को परिलक्षित करता है. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पूरी चयन प्रक्रिया के दौरान प्रतिभागियों की स्क्रिप्ट को जूरी के सामने प्रस्तुत ही नहीं किया गया. बिना स्क्रिप्ट देखे ही अंतिम पांच चिह्नों का निर्धारण कर लिया गया. किसी भी प्रतीक चिह्न को समझने के लिए उसकी स्क्रिप्ट को पढ़ा जाना जरूरी होता है. उदाहरण के लिए, जिस व्यक्ति को यह पता न हो कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज में तीनों रंग किन-किन चीजों को परिलक्षित करते हैं या बीचोबीच मौजूद चक्र क्या दर्शाता है, वह व्यक्ति सिर्फ तिरंगे को देखने भर से उसकी अहमियत नहीं समझ सकता. चिह्नों का कोई निर्धारित अर्थ नहीं होता और प्रत्येक व्यक्ति अपने विवेकानुसार ही उनका अर्थ समझता है. एक गोल आकृति का अर्थ सूर्य से लेकर और शून्य तक कुछ भी हो सकता है. ऐसे में जूरी का स्क्रिप्ट देखे बिना ही इस राष्ट्रीय चिह्न का निर्धारण कर देना कई सवाल खड़े करता है.

(रुपये के प्रतीक चिह्न और प्रतिभागी जो अंतिम पांच में जगह बनाने में कामयाब हुए थे)
ये सारी जानकारियां राकेश कुमार सूचना के अधिकार से हासिल कर ही रहे थे कि इस बीच उन्हें सबसे महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई. 18 दिसंबर 2009 के एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में एक खबर छपी जिसके अनुसार नोंदिता कोरिया ने कुछ वर्ष पूर्व रिजर्व बैंक और प्रधानमंत्री कार्यालय को यह सुझाव दिया था कि भारत में रुपये का कोई प्रतीक चिह्न होना चाहिए. राकेश कुमार को आश्चर्य इस बात का हुआ कि नोंदिता कोरिया नाम की ही एक प्रतिभागी अंतिम पांच में भी चुनी गई थी. उन्होंने पहले यह सुनिश्चित किया कि क्या अंतिम पांच में चुनी गई नोंदिता कोरिया वही हैं जिन्होंने कुछ साल पहले सरकार को सुझाव भेजा था. इस तथ्य के सुनिश्चित होने से यह पूरी प्रक्रिया और भी ज्यादा संदेह के घेरे में आ गई. सरकारी स्तर पर कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं हुआ था कि भारत सरकार को कभी कोई सुझाव इस संबंध में प्राप्त हुआ हो. फिर जिस व्यक्ति ने सुझाव भेजा था, प्रतियोगिता में भी उसी व्यक्ति का अंतिम पांच में चुना जाना संदेह के और भी कारण पैदा करता था. राकेश कुमार एवं अन्य प्रतिभागियों द्वारा इस संबंध में सूचनाएं मांगी गईं. नोंदिता कोरिया मशहूर वास्तुकार चार्ल्स कोरिया की बेटी हैं. चार्ल्स भारत में वास्तु के क्षेत्र के एक दिग्गज माने जाते हैं और पद्मश्री एवं पद्म विभूषण से सम्मानित हो चुके हैं. चार्ल्स कोरिया द्वारा अगस्त, 2005 में रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर को एक पत्र लिखा गया था. इस पत्र में उन्होंने अपनी बेटी नोंदिता कोरिया द्वारा बनाए गए रुपये के प्रतीक को भारतीय रुपये का प्रतीक बनाए जाने के संबंध में विचार करने को लिखा था. इसके साथ ही नोंदिता कोरिया का पत्र भी रिजर्व बैंक को भेजा गया था. फिर 2006 में प्रधानमंत्री कार्यालय को भी चार्ल्स द्वारा ऐसा ही एक पत्र भेजा गया जिसके साथ नोंदिता का पत्र एवं सुझाव भी मौजूद था. प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पत्र को वित्त मंत्रालय को भेजते हुए कहा कि रिजर्व बैंक की राय लेते हुए इस संबंध में उचित कदम उठाए जाएं. तत्कालीन वित्त मंत्री ने भी इस सुझाव पत्र एवं रुपये के प्रस्तावित चिह्न को देखा और फिर वित्त मंत्रालय ने विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय को इस संबंध में एक विज्ञापन जारी करने को कहा. कई बार सूचना मांगने पर भी वित्त मंत्रालय ने नोंदिता कोरिया द्वारा दिए गए सुझाव से संबंधित सूचना राकेश कुमार को नहीं दी. सूचना आयोग के आदेश के बाद जब वित्त मंत्रालय ने मजबूरन सूचना प्रदान भी की तो उसमें नोंदिता कोरिया द्वारा भेजे गए सुझाव पत्र की प्रतिलिपि तो उपलब्ध करवा दी गई लेकिन जो चिह्न उन्होंने भेजा था उसे प्रतिलिपि में से हटा दिया गया. नोंदिता द्वारा भेजा गया प्रतीक प्रदान न किए जाने के पीछे सरकार का तर्क था कि यह चिह्न उनकी 'बौद्धिक संपदा' होने के चलते सार्वजानिक नहीं किया जा सकता.

 नोंदिता  कोरिया
"अगस्त, 2005 में एक दिन मैं अपने खातों से संबंधित कुछ काम कर रही थी. उनमें मेरे अकाउंटेंट ने रुपये को कहीं 'Rs' लिखा था तो कहीं 'Rs.'. इस वजह से कई बार पूर्ण विराम और दशमलव में अंतर कर पाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था. तभी मुझे यह खयाल आया कि भारतीय रुपये का भी कोई प्रतीक चिह्न होना चाहिए. आर्थिक उदारीकरण के साथ हमारे रुपये का वैश्विक बाजार में भी व्यापार बढ़ना तय था, इसलिए मुझे लगा कि हमारे पास रुपये का एक ऐसा प्रतीक होना चाहिए जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचाना जा सके. तो मैंने एक प्रतीक चिह्न बनाया और अगस्त, 2005 में ही रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर को यह सुझाव भेजा. कई महीनों तक जब रिजर्व बैंक से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली तो अप्रैल, 2006 में मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय को इस संबंध में लिखते हुए अपना बनाया हुआ प्रतीक चिह्न भेजा. मुझे लगता था कि यह एक महत्वपूर्ण विषय है और सरकार को इस क्षेत्र में आवश्यक कदम उठाने चाहिए. अंततः मार्च, 2009 में मैंने इंटरनेट पर प्रतियोगिता के बारे में पढ़ा. प्रतियोगिता के विज्ञापन में रुपये के प्रतीक की बिल्कुल वही व्याख्या की गई थी जो मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय और रिजर्व बैंक को भेजी अपनी स्क्रिप्ट में की थी. मैंने भी इसमें हिस्सा लिया और दिसंबर, 2009 में मुझे पता चला कि हजारों प्रतिभागियों में से चुने गए अंतिम पांच में मेरा भी नाम है. मैंने दिल्ली जाकर अपने प्रतीक को जूरी के सामने प्रस्तुत किया. यह तो सरकार का विवेकाधिकार है कि वह किसी भी चिह्न को चुने लेकिन उन्हें इतना तो स्वीकार करना चाहिए था कि इस प्रतीक और इस विचार को मूलतः मैंने जन्म दिया था और सरकार को यह सुझाया था. यह कल्पना मेरी बौद्धिक संपदा है. आप यदि चुने गए अंतिम पांच प्रतीकों को देखें तो पाएंगे कि वे सभी मेरे सुझाए उस प्रतीक के ही इर्द-गिर्द थे."
अभी तक यह तथ्य सबके लिए एक रहस्य ही बना हुआ था कि नोंदिता ने 2005 और 2006 में जो चिह्न प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा था वह क्या था. राकेश कुमार और उनके साथी इस पूरी प्रतियोगिता में हुई गड़बड़ियों के विरुद्ध कदम उठाने की सोच ही रहे थे कि उन्हें एक और विवादास्पद तथ्य मालूम हुआ. प्रतियोगिता की शर्तों के अनुसार एक प्रतिभागी सिर्फ दो चिह्न जमा कर सकता था. लेकिन अंतिम पांच में चुने गए प्रतिभागियों में से डी उदया कुमार ने एक समाचार पत्र को दिए बयान में यह कह दिया कि उनके द्वारा कई चिह्न जमा करवाए गए थे. कायदे से तो ऐसा करने पर वे अयोग्य हो चुके थे और उनकी प्रतिभागिता रद्द हो जानी चाहिए थी लेकिन उन्हें न सिर्फ अंतिम पांच में जगह मिली बल्कि अंततः उन्हें ही विजेता भी घोषित किया गया. अनिल खत्री बताते हैं, ‘हमें सूचना के अधिकार में यह भी जानकारी मिली कि दो से ज्यादा चिह्न जमा करवाने वाले कुछ प्रतिभागियों को प्रतियोगिता से बाहर कर दिया गया था. फिर उदया कुमार को बाहर क्यों नहीं किया गया इसका सही कारण तो सरकार ही बता सकती है.’ राकेश कुमार ने इस संबंध में वित्त मंत्रालय से सूचना मांगी कि क्या चुने गए अंतिम पांच प्रतिभागियों में से किसी ने भी दो से ज्यादा चिह्न जमा करवाए थे. जवाब में सूचना अधिकारी ने यह तथ्य पूरी तरह छिपाना चाहा और झूठी सूचना प्रदान करते हुए कहा कि अंतिम पांच में से किसी भी प्रतिभागी ने दो से ज्यादा चिह्न जमा नहीं करवाए हैं. लेकिन डी उदया कुमार खुद ही अपने बयान में कह चुके थे कि उन्होंने कई चिह्न जमा करवाए थे तो सूचना अधिकारी को मजबूरन यह कबूलना पड़ा और उन्होंने फिर से सूचना प्रदान करते हुए यह मान लिया कि उदया कुमार द्वारा चार चिह्न जमा करवाए गए थे. इसके बाद वित्त मंत्रालय का कहना था कि उदया कुमार के पहले दो चिह्नों को ही जूरी के सामने भेजा गया था और सिर्फ उन्हें सही माना गया था जो कि मंत्रालय को पहले प्राप्त हुए थे.  लेकिन स्वयं वित्त मंत्रालय ने यह स्वीकार किया है कि उनके पास इसका कोई भी रिकॉर्ड नहीं है कि उन्हें कौन-सा आवेदन किस तिथि को प्राप्त हुआ. सभी आवेदनों की जांच मंत्रालय द्वारा आवेदन प्राप्त करने की अंतिम तिथि के पांच दिन बाद शुरू की गई. ऐसे में डी उदया कुमार के कौन-से चिह्न पहले प्राप्त हुए थे यह मंत्रालय ने कैसे तय किया, इसका जवाब स्वयं मंत्रालय के पास भी नहीं है.
नोंदिता कोरिया द्वारा जो प्रतीक 2005 में रिजर्व बैंक को भेजा गया था वह बिल्कुल वही था जिसे आज हम रुपये के प्रतीक के तौर पर पहचानते हैं
प्रतियोगिता में हुई इतनी गलतियों की पुख्ता जानकारी जब राकेश कुमार को हो गई तो उन्होंने वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति को 138 पन्नों का एक ज्ञापन भेजकर इस पूरी प्रक्रिया में हो रही गड़बड़ियों से अवगत करवाया और इस संबंध में उच्च स्तरीय जांच की मांग की. लेकिन कई साक्ष्य उपलब्ध कराने के बाद भी उन पर जांच करने के बजाय 15 जुलाई, 2010 को उदया कुमार को विजेता घोषित कर दिया गया. इसके बाद राकेश कुमार ने उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की जिसमें उन्होंने सरकार के इस फैसले पर रोक लगाने एवं पूरी प्रक्रिया पुनः आयोजित करवाने की प्रार्थना की. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने क्षेत्राधिकार के आधार पर यह याचिका खारिज कर दी. अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता स्वयं प्रतियोगिता का एक प्रतिभागी था इसलिए उसके द्वारा जनहित याचिका नहीं की जा सकती. 
राकेश कुमार की ही तरह कुछ अन्य लोग भी विभिन्न विभागों से इस प्रतियोगिता के संबंध में जानकारी मांग रहे थे. नोंदिता कोरिया का जो सुझाव पत्र वित्त मंत्रालय से कई बार आवेदन करने पर भी राकेश को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हुआ था वही पत्र मुंबई के एक प्रतिभागी अनिल खत्री को रिजर्व बैंक से सूचना मांगने पर हासिल हो गया. इस पत्र के प्राप्त होने पर सभी को हैरान करने वाली जानकारी मिली. नोंदिता कोरिया द्वारा रुपये का जो प्रतीक 2005 में रिजर्व बैंक को भेजा गया था वह चिह्न बिल्कुल वही था जिसे आज हम रुपये के प्रतीक के तौर पर पहचानते हैं. इस जानकारी ने सबको चौंकाया जरूर लेकिन इससे ही सरकार की मंशा भी समझने में मदद मिली. राकेश कुमार बताते हैं, ‘नोंदिता कोरिया के पत्र में सुझाए गए चिह्न को देखकर यह स्पष्ट हुआ कि सरकार पहले ही अपना मन बना चुकी थी कि रुपए का प्रतीक किसे चुनना है. यह पूरी प्रतियोगिता सिर्फ एक दिखावा और अपने कुछ नजदीकियों को पुरस्कृत करने का माध्यम ही थी.’ जूरी के सदस्य वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक से भी थे जिन्हें इस चिह्न की पहले से ही जानकारी थी. चुने गए अंतिम पांच चिह्न देखकर भी यह साफ होता है कि ये सभी एक ही तरह की सोच के हैं. शायद यही कारण था कि इतना कम समय लगाते हुए जूरी ने हजारों आवेदनों में से उन्हीं को चुना जिसका सुझाव सालों पहले ही प्राप्त हो चुका था. सरकार के इस पूर्वाग्रह के कारण शायद कई ऐसी रचनाओं को देखा भी नहीं गया होगा जो एक बेहतर विकल्प हो सकती थीं.
डी उदया कुमार के जिस चिह्न को आज हम रुपये के प्रतीक के रूप में पहचानते हैं उसके बारे में यह भी कहा जा रहा है कि वह प्रतियोगिता के मानकों पर भी खरा नहीं उतरता था. इस चिह्न को सबसे पहले बनाने वाली नोंदिता कोरिया बताती हैं, ‘मैंने प्रतियोगिता के दौरान इस चिह्न में संशोधन और सुधार करके एक नया चिह्न प्रस्तुत किया था. पुराने चिह्न को जब छोटा किया जाता था तो उसकी ऊपर की दोनों रेखाएं आपस में मिल जाती थीं इसलिए वह प्रतियोगिता के मानकों पर खरा नहीं उतरता था.’ खत्री बताते हैं, ‘विज्ञापन के अनुसार प्रतिभागियों से अपने चिह्न को विभिन्न आकारों में प्रस्तुत करने को कहा गया था. उदया कुमार का यह चिह्न उन मानकों पर खरा नहीं उतरता था. जूरी ने भी यह खामी देखी होगी लेकिन फिर भी वही चिह्न चुन लिया गया.’ इस प्रतियोगिता के लिए प्रत्येक प्रतिभागी को 500 रुपये आवेदन शुल्क के तौर पर जमा करने थे. हजारों प्रतिभागियों द्वारा जमा किए गए आवेदन शुल्क से तो सरकार की कमाई हुई ही लेकिन पैसों का यह खेल यहीं समाप्त नहीं होता. जानकार बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर के ये प्रतीक चिह्न राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े तो होते ही हैं साथ ही वे अरबों रुपये के व्यापार को भी प्रभावित करते हैं. रुपये के इस चिह्न को भारतीय मुद्रा के साथ-साथ कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल फोन के कीपैड तक में उतारा जाता है. ऐसे में बड़ी कंपनियां सबसे पहले इस चिह्न को अपने उत्पादों में उतारने के लिए करोड़ों रुपए लगा सकती हैं और सबसे पहले इसे हासिल करके हर जगह छापना चाहती हैं. आरोप लग रहे हैं कि अगर सरकार ने पहले ही तय कर लिया था कि रुपये का चिह्न क्या होना है तो मुमकिन है कि कुछ बड़े व्यापारियों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही हो. 
उधर, डी उदया कुमार कहते हैं, ‘मुझे इस संबंध में कोई भी जानकारी नहीं थी कि किसी ने रुपये के प्रतीक के संबंध में पहले कभी सरकार को सुझाव दिया है. प्रतियोगिता के बारे में मुझे आईआईटी बॉम्बे के मेरे एक मित्र ने बताया था. फिर दिल्ली में अंतिम प्रेजेंटेशन के दौरान मैंने सुना कि किसी प्रतिभागी ने इस संबंध में पहले कभी सरकार को सुझाव भेजा था.’  यह बात सिर्फ राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है. रुपये का प्रतीक चिह्न अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी हमारी पहचान बन चुका है  या बन रहा है. इतने महत्वपूर्ण और राष्ट्रीय सम्मान के चिह्न के चयन में हुई अनियमितताओं से आप लोग भी शर्मिंदा तो हो सकते हैं लेकिन भविष्य में जब भी आपका सामना इस प्रश्न से होगा कि भारतीय रुपये के प्रतीक का निर्माता कौन है तो पूरे अंक आपको डी उदया कुमार के रूप में दिया हुआ उत्तर ही दिला सकता है.   
अन्य प्रतीक चिन्हों के साथ भी लूटमारी का खेल खेला गया है.
सिर्फ रुपए का प्रतीक चिह्न ही ऐसा नहीं है जिसमें नियमों की अनदेखी की गई हो. राष्ट्रीय महत्व के अन्य कई प्रतीक चिह्नों का चयन पिछले कुछ सालों में इसी तरह से किया गया है. ऐसे ही चिह्नों के निर्धारण में हुई गड़बड़ियों के बाद राकेश कुमार सिंह द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी. इस याचिका में ऐसे कुल पांच चिह्नों का जिक्र किया गया था जिनमें सरकार मनमाने तरीकों से फैसले कर चुकी है. सूचना के अधिकार का प्रतीक/लोगो भी इनमें से एक है. सूचना का अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो सीधे तौर से जनता के ही हाथों में है. इस अधिकार के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए कई संस्थाएं कार्य कर रही हैं. स्वयं सरकार भी इस अधिकार के प्रति लोगों को जागरूक करने की बात करती है. लेकिन इस अधिकार का जो 'लोगो' सरकार द्वारा तय किया गया है उससे अभी तक अधिकतर लोग परिचित नहीं हैं. राकेश कुमार की जनहित याचिका की पैरवी कर रहे अधिवक्ता कमल कुमार पांडे बताते हैं, ‘सूचना के अधिकार के 'लोगो' का निर्धारण यदि एक राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता आयोजित करके होता और ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें शामिल होते तो इसके दोहरे परिणाम होते. एक तरफ तो ज्यादा लोगों की भागीदारी से ज्यादा विचार और रचनाएं सरकार तक पहुंचतीं वहीं दूसरी तरफ ऐसी प्रतियोगिता लोगों को इस अधिकार के प्रति जागरूक भी करती.’
सूचना के अधिकार का 'लोगो' सरकार ने बिना कोई प्रतियोगिता करवाए ही किसी व्यक्ति से बनवा लिया था. लेकिन जिन प्रतीक चिह्नों अथवा 'लोगो' के निर्धारण के लिए सरकार द्वारा प्रतियोगिताएं आयोजित की भी गईं वहां भी ऐसा सिर्फ औपचारिकता पूरी करने को ही किया गया. सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजना 'आधार' के लोगो का चयन भी कई खामियों से भरा है. 'समाज के अंतिम व्यक्ति को उसकी पहचान का बोध कराने' के उद्देश्य से चलाई जा रही इस योजना के लोगो के लिए एक प्रतियोगिता करवाई गई. प्रतियोगिता का विज्ञापन सिर्फ अंग्रेजी भाषा में जारी किया गया. इस योजना के बारे में लोगों को जानकारी देने और अधिक से अधिक लोगों को इससे जोड़ने के लिए भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण में अलग से एक समिति का भी गठन किया गया है जिसने कि इस प्रतियोगिता में जूरी का भी कार्य किया. लेकिन इस विशेष समिति द्वारा भी इस प्रतियोगिता में ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया गया. लोगो का चयन करने हेतु जिस जूरी को चुना गया था उसमें से कई लोग चयन के दिन उपस्थित भी नहीं थे और जो सदस्य उपस्थित थे उन्होंने मात्र तीन घंटे में 2,270 आवेदनों में से सबसे बेहतरीन लोगो को छांटने का करिश्मा कर दिखाया. विजेता को एक लाख रुपये का इनाम मिला और 'आधार' को उसका लोगो.
ये चिह्न या लोगो सिर्फ राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों, संस्थाओं या संस्थानों के प्रतीक नहीं होते बल्कि उनको एक ऐसी विशेष पहचान भी देते हैं जिसमें हमारे समाज और सांस्कृतिक धरोहर की भी झलक मिलती है. अनिल खत्री बताते हैं, ‘ऐसी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों को किसी इनाम का लालच नहीं बल्कि देश के प्रति अपने योगदान की लालसा होती है. यह तथ्य ही प्रतिभागियों को उत्साहित कर देता है कि उनकी रचना देश के किसी महत्वपूर्ण मुद्दे या संस्थान का प्रतीक बनेगी. लेकिन जब इन प्रतियोगिताओं में ऐसी धोखाधड़ी सामने आती है तो लोग अपने ही देश से ठगा हुआ महसूस करते हैं.’ 
रेलवे द्वारा लाखों रुपये खर्च करके और लाखों का इनाम देकर बनवाए गए इस नए लोगो को आज कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है
इंडियन डिजाइन काउंसिल ने भी एक ऐसी ही प्रतियोगिता आयोजित की थी. इस संस्था पर सारे देश के डिजाइनों की जिम्मेदारी है, लेकिन डिजाइन के निर्धारण में सबसे ज्यादा गड़बड़ियां यहीं हुई हैं. जापान के 'जी मार्क' और जर्मनी के 'रेड डॉट' की ही तरह भारत में 'आई मार्क' के चयन हेतु यह प्रतियोगिता आयोजित हुई थी. इस प्रतियोगिता का विज्ञापन सिर्फ एक इंटरनेट ग्रुप पर जारी किया गया. यह ग्रुप सुधीर शर्मा नाम के एक व्यक्ति द्वारा बनाया गया था जो स्वयं ही इस प्रतियोगिता की जूरी में भी शामिल थे. इस ग्रुप के सीमित सदस्य हैं और सिर्फ वे सदस्य ही इस ग्रुप की गतिविधियों को देख सकते हैं. प्रतियोगिता के लिए चुने गए पांच सबसे बेहतरीन लोगो में से चार सुधीर शर्मा के संस्थान से ही थे. चयन प्रक्रिया में भी सुधीर शर्मा की अहम भूमिका थी. आखिर में जो डिजाइन चुना गया वह सुधीर शर्मा के संस्थान वालों द्वारा ही बनाया गया था. इस तरह से एक राष्ट्रीय चिह्न चुनने पर काफी लोगों द्वारा आपत्ति जताई गई जिसके चलते इस प्रतियोगिता को रद्द करके एक नए सिरे से आयोजित किया गया.
ऐसी ही एक प्रतियोगिता रेल मंत्रालय ने भी आयोजित की थी. प्रतियोगिता के विज्ञापन में कहा गया कि भारतीय रेल के लोगो की पुनर्कल्पना हेतु प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है. इस प्रतियोगिता में विजेता के लिए पांच लाख रुपये का इनाम रखा गया. पांच मई, 2010 को जारी हुए विज्ञापन में आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 12 मई, 2010 तय की गई. इस तरह से पूरी प्रतियोगिता के लिए सिर्फ एक सप्ताह का समय दिया गया. इस प्रतियोगिता में जिस 'पैम एडवर्टाइजिंग ऐंड मार्केटिंग' कंपनी को विजेता घोषित किया गया वह पहले से भी भारतीय रेल के लिए काम कर रही थी. कुछ समय बाद रेल मंत्रालय द्वारा यह कहा गया कि नया लोगो सिर्फ राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान इस्तेमाल किया जाएगा और भारतीय रेल का लोगो वही रहेगा जो कई सालों से है. इस प्रतियोगिता की चयन समिति में सभी लोग रेल मंत्रालय से ही थे और डिजाइन के क्षेत्र से किसी भी विशेषज्ञ को चयन समिति में नियुक्त नहीं किया गया. राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय रेल भी एक प्रमुख प्रायोजक था. जाहिर है इस नए लोगो को खेलों के टिकट से लेकर और कई जगह छापने का काम बड़ी-बड़ी कंपनियों को दिया गया होगा. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता बताते हैं, ‘रेलवे द्वारा करवाई इस प्रतियोगिता से उन कंपनियों के अलावा किसी को फायदा नहीं हुआ जिनको इस नए लोगो को छापने के ठेके दिए गए होंगे और जिसने इसे बनाकर इनाम जीता. ऐसी अनावश्यक प्रतियोगिता आयोजित करना खुले आम जनता के पैसों को लूटने का एक तरीका ही है.’ रेलवे द्वारा लाखों रुपये खर्च करके और लाखों का ईनाम देकर बनवाए गए इस नए लोगो को आज कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है.
 बहरहाल राकेश कुमार द्वारा इन सभी गड़बड़ियों को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने से आने वाले समय में ऐसी लूट होने की आशंका कुछ हद तक कम हो गई है. बीती 30 जनवरी को दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस जनहित याचिका में फैसला देते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं. इन निर्देशों में तीन महीने के भीतर सरकार को अपने सभी मंत्रालयों एवं विभागों में ऐसी प्रतियोगिताएं आयोजित करवाने हेतु नियमावली तैयार करने को कहा गया है. अधिवक्ता कमल कुमार पांडेय कहते हैं, ‘उच्च न्यायालय का यह फैसला हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है. अभी तो सरकार ने इन चिह्नों के जरिए लूट का नया रास्ता ढूंढ़ा ही था. न्यायालय का अगर यह आदेश न आता तो आने वाले कुछ समय में न जाने कितने और ऐसे ही मनमाने फैसले सरकार द्वारा कर लिए गए होते. इस लिहाज से राकेश कुमार देश के लिए एक बहुत बड़ा काम इस मायने में तो कर ही चुके हैं कि भ्रष्टाचार की एक पूरी सड़क पर उन्होंने नाकाबंदी कर दी है.’ 
चिह्नों (लोगो) के जरिए लूट का धंधा बनाये सरकार के अधिकारीयों को सबक सिखाने के उद्देश्य से श्री राकेश कुमार सिंह और अनिल खत्री ने बहुत अधिक प्रयास किये है. उसके लिए हम शत-शत नमन करते हैं. दोस्तों, हमें आपको बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि श्री राकेश कुमार सिंह जी, मेरे साथ फेसबुक पर भी जुड़े हुए है. आप से विनम्र अनुरोध है कि पूरा समाचार जरुर पढ़ें और अपनी टिप्पणी के साथ श्री राकेश कुमार सिंह को बधाई देना ना भूले. आज जहाँ देश हर रोज नित एक नया घोटला सामने आ रहा है, उसको देखते हुए हमें "श्री राकेश कुमार सिंह" जैसे साहसी होने के साथ ही एकजुट होने की जरूरत है.          साभार-तहलका डॉट कॉम से

शुक्रवार, मार्च 15, 2013

दिल्ली पुलिस ने थूककर चाटा, अपने बयान से पलटी

सुभाष तोमर की मौत में गिरफ्तार 8 लोग बेकसूर: पुलिस

नई दिल्ली:दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद विरोध-प्रदर्शन के दौरान कांस्टेबल सुभाष तोमर की मौत पर पुलिस ने अदालत में यू-टर्न ले लिया है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि इस मामले में उसने जिन आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया वो बेगुनाह थे। हाईकोर्ट में इस मामले की विस्तृत सुनवाई अब 20 मार्च को होनी है। 
गौरतलब है कि वसंत विहार गैंगरेप के खिलाफ इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन के दौरान कांस्टेबल सुभाष तोमर अचेत हो गए। अस्पताल में इलाज के दौरान दो दिन बाद उनकी मौत हो गई थी। पुलिस ने इस मामले में इलाके में मौजूद आठ लोगों को आरोपी बनाया था, लेकिन मंगलवार को हाईकोर्ट में पुलिस का रुख बदल गया। पुलिस ने कांस्टेबल की मौत के मामले में इनमें से किसी शख्स की भूमिका होने से इनकार कर दिया।
 दरअसल दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी। अपील में मांग की गई थी कि उनके खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर को रद्द किया जाए। इस बाबत दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा था। मंगलवार को दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि कांस्टेबल सुभाष तोमर की मौत के मामले में एफआईआर में दर्ज 8 लोगों की कोई भूमिका नहीं है। इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है जिससे ये साबित हो सके कि कांस्टेबल सुभाष तोमर की मौत इनकी वजह से हुई। जहां तक प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक चीजों को नुकसान पहुंचाने का आरोप है तो उसमें इनकी भूमिका है।
इंडिया गेट पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने जिन 8 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। उनमें कैलाश जोशी, अमित जोशी, शांतनु कुमार, नफीस, शंकर बिष्ट, नन्द कुमार, अभिषेक और चमन कुमार का नाम शामिल था। इनमें से चमन कुमार आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता है। इन सभी को अगले ही दिन जमानत मिल गई थी। हाईकोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 20 मार्च को मुकर्रर की है। इस दिन अदालत विस्तृत तरीके से पूरे मामले की सुनवाई करेगी।
क्या हमारे देश का अंधा कानून कोई मुआवजा देगा ?
अब जबकि दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में यह मान लिया कि कांस्टेबल सुभाष तोमर की हत्या उन आठ प्रदर्शनकारियों ने नहीं की है जिन्हें उसने हत्या का आरोपी बता गिरफ्तार किया था तो ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अब उन पुलिसवालों की जवाबदेही कौन तय करेगा जिन्होंने कहा था कि इन्हीं लोगों ने कांस्टेबल की पिटाई की थी, जिससे उनकी मौत हुई। हालांकि इस मामले में दो प्रत्यक्षदर्शियों के सामने आने और उनके द्वारा कांस्टेबल तोमर की मौत भागते हुए गिरने के कारण होने की बात कहने के बावजूद दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी यही कहते रहे थे कि कांस्टेबल तोमर की हत्या हुई है और हत्या के दोषी वे प्रदर्शनकारी ही हैं जिन्हें गिरफ्तार किया गया है। इतना ही नहीं, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह साबित हो गया कि सुभाष तोमर की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है, तब भी पुलिस यह कहने से नहीं चूकी कि प्रदर्शनकारियों की पिटाई के कारण ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा, जिससे उनकी मौत हो गई। शुरू से ही पुलिस इस मामले में कमजोर पड़ती नजर आ रही थी। जिन आठ लोगों को उसने हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था और कहा था कि ये लोग इंडिया गेट पर ही मौजूद थे, उनमें से दो लोगों के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन में होने की पुष्टि सीसीटीवी कैमरे मे माध्यम से जनवरी में ही हो गई थी। इतना ही नहीं, क्राइम ब्रांच द्वारा कई सीसीटीवी फुटेज को खंगालने और अनेकों गवाहों से पूछताछ करने के बावजूद उसके हाथ ऐसा कोई सबूत नहीं लगा जिससे दिल्ली पुलिस का दावा सच साबित हो पाता कि प्रदर्शनकारियों की पिटाई से कांस्टेबल तोमर की मौत हुई। अब घटना के लगभग ढाई महीने बाद दिल्ली पुलिस को मानना पड़ा कि उसने बेगुनाहों को हत्या के आरोप में पकड़ लिया और उसके पास उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। निश्चित ही हमें इस पूरे प्रकरण में उन दो बहादुर प्रत्यक्षदर्शियों योगेंद्र और पाउलिन को याद करना होगा सच लाने और कहने की हिम्मत जुटाई कि कांस्टेबल तोमर को किसी ने नहीं मारा, बल्कि प्रदर्शनकारियों के पीछे भागते हुए वे स्वयं गिर पड़े थे। 
जिस समय हत्या के आरोप में पुलिस ने आठ लोगों को गिरफ्तार किया, तब शायद पुलिस के आला अधिकारियों ने सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें इस मामले में यूं किरकिरी झेलनी पड़ेगी। लेकिन एक सवाल जो उठता है वह यह कि यदि यह मामला इतने जोर-शोर से मीडिया में नहीं आता और बहादुरी के साथ प्रत्यक्षदर्शी अपनी बात नहीं रखते तो उन आठ बेगुनाहों का क्या होता जिन्हें पुलिस हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर चुकी थी? अब इसे पुलिस की एक और नाकामी कहें या सचाई की जीत, लेकिन इतना तय है कि इस घटना ने एक बार फिर पुलिस को न केवल बैकफुट पर ला दिया है बल्कि उस विश्वास को भी ठेस पहुंची है जो बमुश्किल पुलिस पर जनता कायम कर पाती है। जब बात पुलिस और जनता के बीच आपसी रिश्ते और तालमेल की होती है तो यही दोहराया जाता है कि पुलिस को ऐसे तरीके अपनाने होंगे जो उनके प्रति जनता में विश्वास पैदा कर सकें। लेकिन इस तरह की घटनाएं उस विश्वास को पनपने से पहले ही खत्म कर देती हैं। हत्या का आरोप झेल रहे वे आठ बेकसूर नौजवान आज भले ही बरी कर दिए गए हों, लेकिन ढाई पुलिस प्रशासन कर पाएगा? दिल्ली महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर बनता जा रहा है। ऐसे में यहां की पुलिस फोर्स ही जब अपने कामों की वजह से सवालों के घेरे में घिरती रहे तो राजधानी के नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न जटिल होना स्वाभाविक है। चूंकि दिल्ली देश की राजधानी है, इसलिए यहां पुलिस की प्रत्येक कार्यपण्राली और सिस्टम अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण और आदर्श बनते हैं। ऐसे में यदि दिल्ली पुलिस का अमानवीय चरित्र सामने आता है तो निश्चित ही संपूर्ण पुलिस व्यवस्था का मनोबल गिरेगा। 16 दिसम्बर, 2012 के गैंगरेप मामले के बाद गठित उषा मेहरा आयोग ने भी दिल्ली पुलिस की लचर व्यवस्था का जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया था। गृह मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में मेहरा कमीशन ने साफ कहा था कि गैंगरेप की घटना के लिए दिल्ली पुलिस का लचर रवैया ही जिम्मेवार है। जिस बस में गैंगरेप की घटना हुई, उसका कई बार चालान कट चुका था, बावजूद इसके वह राजधानी की सड़कों पर दौड़ती रही जो पुलिस सिस्टम की नाकामी का द्योतक है। साथ ही कमीशन ने दिल्ली पुलिस को संवेदनशील बनाने की भी बात कही थी। लेकिन कांस्टेबल सुभाष तोमर की मौत के बाद जिस तरह से दिल्ली पुलिस ने अपनी भड़ास निकालने के लिए बिना किसी सबूत के आठ लोगों को गिरफ्तार करने में तत्परता दिखाई, यदि इतनी तत्परता वह अपराध पर लगाम लगाने में दिखाए तो पुलिस निश्चित ही अपनी गिरती साख को बचा सकती है। भले ही दिल्ली पुलिस ने कबूलनामे में अपनी भूल स्वीकार कर ली हो, पर क्या इस मामले में किसी की भी जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए? 
इस मामले में जो सबसे चौंकाने वाली बात रही, वह यह कि खुद दिल्ली पुलिस कमिश्नर तक ने बिना किसी जांच-पड़ताल और गवाहों के मान लिया कि कांस्टेबल तोमर की हत्या ही हुई है। एक सवाल जो बार-बार उठना स्वभाविक है कि आखिरकार पुलिस को क्यों अपने ही एक जाबांज कांस्टेबल की मौत पर यूं गलतबयानी करनी पड़ी। अब तो यही लगता है कि कांस्टेबल तोमर को शहीद का दर्जा देने की बजाए दिल्ली पुलिस उनकी मौत को ढाल बना आखिर तक अपना ही खेल खेलती रही।
सुभाष तोमर की मौत में गिरफ्तार 8 लोग बेकसूर: पुलिस
यदि दोनों बहादुर प्रत्यक्षदर्शियों योगेंद्र और पाउलिन आगे नहीं आते तब क्या होता और यदि बेचारे गरीब होते एवं उनके पास वकील करने के लिए धन नहीं होता. तब बेकसूर होते हुए भी जेल सड़ जाते या किसी दिन तनाव में आकर "आत्महत्या" करने जैसा कदम उठा सकते थें. आज के समय में जेल में कितने ही गरीब और बेकसूर लोग दिल्ली पुलिस द्वारा फंसाए केसों में नारकीय जीवन जी रहे है. आज के समय में सरकार की नीतियां "आम आदमी" को अपराधी बनने के लिए मजबूर कर रही है.  
अब यह सवाल उठता है कि क्या सुभाष तोमर की मौत में गिरफ्तार 8 बेकसूर लोगों को दिल्ली पुलिस या हमारे देश का अंधा कानून कोई मुआवजा देगा. यदि नहीं तो क्यों नहीं ? क्या हमारे देश का अंधा कानून दिल्ली पुलिस के उन अधिकारियों को कोई सजा देगा ? यदि नहीं तो क्यों नहीं? इस मामले में हाईकोर्ट को चाहिए कि दिल्ली पुलिस के उन जिम्मेदार अधिकारीयों को जिन्होंने उन आठ बेकसूर लोगों को गिरफ्तार किया था उनको सख्त से सख्त सजा देकर एक मिसाल कायम करनी चाहिए. यदि हमारे देश का अंधा कानून कोई सजा नहीं देता है तो लोगों का न्याय से विश्वास उठ जायेगा और न्यायधीशों की देश के संविधान के प्रति ईमानदारी पर भी एक प्रश्नचिन्ह लग जायेगा. फिर कोई भी पुलिस का अधिकारी किसी भी "आम आदमी" फर्जी केसों में फंसा दिया करेगा. 

शनिवार, फ़रवरी 02, 2013

भगवान ऐसा परिवार सबको दें

दोस्तों, आपके लिए बहुत ही अच्छी खबर है कि मेरा समाचार पत्र फिर से शुरू हो गया है. आप तक उसको पहुँचाने का काफी प्रयास कर रहा था. लेकिन तकनीकी जानकारी के कारण अपने आपको बहुत असमर्थ पा रहा था. आज मेरे गुरुदेव श्री दिनेशराय द्विवेदी जी के सुपुत्र ने मुझे "पेजमेकर" सोफ्टवेयर से "पीडीएफ" फाइल बना सिखा दिया है. मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है. 
मेरे गुरुदेव के सुपुत्र Vaibhav Dwivedi ने मुम्बई में बैठे ही बैठे मेरे कम्प्युटर में कुछ सोफ्टवेयर लोड (नई तकनीकी द्वारा) किये. लगभग साढ़े तीन घंटे की मेहनत के बाद वैभव द्विवेदी ने मेरी इच्छा को पूरा कर दिया और बहुत ही प्रतिभाशाली भी है. वैसे इनके द्वारा इस मदद से मेरे प्रकाशन कार्य को पंख लग जायेगे. मैंने इनको बहुत परेशान किया है. मगर सारी जिंदगी वैभव द्विवेदी का एहसानमंद रहूँगा. 
 मेरे गुरुदेव जी का पूरा परिवार समाज में अलग स्थान रखता है और उसमें एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली सदस्य है. जहाँ एक ओर मेरे गुरुदेव वकील है और उनकी पत्नी बहुत अच्छी "कुक" है. वहीँ दूसरी ओर उनकी सुपुत्री Purva Dwivedi एक बहुत बड़ी कम्पनी में बहुत बड़े पद आसीन होकर पूरी जिम्मेदारी से अपना फर्ज निभा रही है और उनके सुपुत्र मुम्बई में एक कम्पनी में "सोफ्टवेयर इंजीनियर" के पद की गरिमा में चार चाँद लगा रहे है. उनकी प्रतिभा को शब्दों बयान करना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है. 
शकुंतला प्रेस ऑफ इण्डिया प्रकाशन परिवार भगवान महावीर स्वामी जी से प्रार्थना करता है कि गुरुदेव दिनेशराय द्विवेदी के पूरे परिवार को स्वस्थ रखे और उनकी यश कीर्ति दुनिया के चारों दिशाओं में गतिमान हो.  
आप सभी पाठक भी "जीवन का लक्ष्य"(यहाँ पर टिप्पणी बॉक्स में अपना ईमेल पता छोड़कर) का नया अंक पढ़ सकते हैं.

सोमवार, दिसंबर 17, 2012

सिरफिरे पत्रकारों की आवश्यकता है

 दोस्तों, मैं बहुत जल्द अपना अखबार फिर से शुरू कर रहा हूँ. जो काफी समय से बंद था. क्या आप हमारे अखबार के साथ जुडना पसंद करेंगे/ करेंगी. यदि आप थोड़ा प्रयास करके हिन्दी की टाइपिंग सीख लेते/लेती है. तब आपके सभी लेख प्रकाशित हो सकते हैं. इसके लिए आपको अपने कम्प्युटर में पेजमेकर का सोफ्टवेयर लोड करके हिन्दी के "नारद" फॉण्ट में टाइप करके अपना लेख/कविता और रचनाएँ ईमेल करनी होगी. अखबार में नेट वाली हिन्दी नहीं चल सकती है, क्योंकि यह मंगल फॉण्ट में होती है. इसलिए पेजमेकर सोफ्टवेयर में "नारद" फॉण्ट में लिखकर इमेल करनी होगी. हम पोजिटिव से अखबार नहीं छापते हैं, बटर पेपर से छपता है. हिन्दी का "नारद" फॉण्ट मोटा है और इसकी प्रिंटिंग भी अच्छी आती है. पेजमेकर में हिन्दी कैसे लिखें की जानकारी के लिए उपरोक्त लिंक http://rksirfiraa.blogspot.in/2010/08/blog-post_23.html को पढ़ें. मुझे लगता है हमारे अखबार से जुड़ने के बाद आपके द्वारा उठाये मुद्दों को काफी गम्भीरता से लिया जायेगा. आपके पास पत्रकारिता से जुड़े कानून और अधिकार भी होंगे, जो आपके लिए हितकारी होंगे. 


 यदि आपको पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं है या कोई डिग्री नहीं है. उसकी कोई बात नहीं है. सिर्फ सच लिखने के लिए ईमानदारी और देश व समाज के प्रति समर्पणभाव ही काफी है. डिग्री की कोई जरूरत नहीं है. लोगों के पास डिग्री होने के बाद सच नहीं लिख पाते हैं. सच लिखने के लिए एक इंसान बनकर अपने ज़मीर को जिन्दा रखना होता है. आपको पत्रकरिता के अनुभव से संबंधित काफी मदद करूँगा. पत्रकारिता से जुड़ी काफी अच्छी किताबों का मेरे पास संग्रह है. जो आपके लिए काफी लाभकारी व हितकारी होगी. आपके हर जनहित मुद्दों को प्रकाशित करने के लिए भी हम तैयार है.  सच लिखने और प्रकाशित करने के मामले में हम "पागल" संपादक है. सच के लिए मौत को भी खिलौना बनाकर खेलते हैं. हम आपके साथ है. हमें आपका इंतजार रहेगा..........................
    
 दोस्तों, बिना विज्ञापन के अखबार के चलना लोहे के चने चबाने के समान होता है. छोटे अख़बारों के पास साधन कम होते है और ईमानदार पत्रकार के साथ अन्य कई आर्थिक समस्या भी होती है और सच लिखने के लिए "पैसा" पहली जरूरत है. यदि किसी ईमानदार पत्रकार के क्षेत्रीय नेताओं ( छुटनभये नेता, पार्षद, विधायक, सांसद ) से संबंध न हो और उसके हित की बात न लिखो तो विज्ञापनदाता को भी धमकाकर विज्ञापन देने के लिए इंकार(छापे का डर दिखाकर) तक करवा देता है. यह तो मेरा कलम से सच लिखने के प्रति पागलपन है. इसलिए विज्ञापनदातों से अपने अच्छे संबंध है. मेरी विज्ञापन एजेंसी भी है. मैं सारे समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के लिए विज्ञापन भी बुक करता हूँ. आप अपने विज्ञापन और लेख आदि भेजकर सहयोग करें.
  दोस्तों, "जीवन का लक्ष्य" समाचार पत्र का एक अंक नए साल पर आ रहा है और दूसरा अंक लोहड़ी पर आने की पूरी उम्मीद है. अब मेरा फेसबुक, गूगल और ब्लॉग आदि पर कम ही आना होगा. अपनी पत्रकारिता शुरू करके जल्द से जल्द कर्ज मुक्त होना है. अपने सारे कार्यों को दुबारा शुरू करना है. प्रकाशन परिवार की पूरी व्यवस्था को ठीक करना है. ऑफिस की फाइल आदि के साथ बहुत से अन्य कार्य भी करने है.         
   दोस्तों, उपरोक्त इस पोस्ट के साथ लगे चित्र को डाऊनलोड करके जरुर पढ़ें.

शुक्रवार, अक्टूबर 26, 2012

सरकार, पुलिस और लड़की वालों का गुंडाराज कब चलेगा ?


चर्चित निशा शर्मा केस यू.पी. का है. उसमें फंसे मेरे मित्र मुनीष दलाल को नौ साल "अदालत" में चले मामले में दोषी नहीं माना. लेकिन इन नौ साल में उसका कैरियर बर्बाद हो गया. नौ साल कोर्ट के चक्कर लगाते हुए लाखों रूपये खर्च हो गए. क्या बिगाड़ लिया यू.पी. पुलिस और सरकार ने "निशा शर्मा" का ? यह तो उदाहरण मात्र एक ही केस है. ऐसे अब तक लाखों केस झूठे साबित हो चुके है. आज लड़की वालों की तरफ से दहेज मांगने के लाखों केस राज्य सरकार पूरे देश भर में लड़ रही है. जिसमें एक सर्व के अनुसार 94 % केस झूठे साबित हो रहे है, जिसके कारण न्याय मिलने में देरी हो रही है और जजों का कीमती समय खराब होने के साथ ही देश को आर्थिक नुकसान होने के साथ ही लाखों पुरुष मानसिक दबाब ना सहन नहीं कर पाने के कारण आत्महत्या कर लेते है. सरकार और देश की अदालतें आँख बंद करके बैठी हुई है. यदि सरकार कुछ नहीं कर रही है तो जजों को चाहिए कि लड़की वालों को सख्त से सख्त सजा देते हुए पुरुष को मुआवजा दिलवाए. जजों को एक-दो मामलों खुद संज्ञान लेकर लड़की वालों पर कार्यवाही करने की जरूरत है. फिर कोई भी लड़की वाला झूठे केस दर्ज नहीं करवाएगा. इससे दोषी को सजा मिलेगी और निर्दोष शोषित नहीं होगा. दहेज के झूठे मामलों को सुप्रीम कोर्ट अपनी एक टिप्पणी में "घरेलू आतंकवाद" की संज्ञा दे चुका है. आज अपराध हर राज्य में हो रहे है. बस कुछ हाई प्रोफाइल ही हमारे सामने आ पाते है, बाकियों की एफ.आई.आर ही दर्ज नहीं होती है.
 

गुरुवार, सितंबर 20, 2012

हम कौन है ?


हम कौन है ? वैसे तो हम मात्र एक जीव के कुछ भी नहीं है. लेकिन इस मृत्युलोक (दुनियाँ) में हर एक मनुष्य की उसके नाम और काम से एक पहचान रखी गई है. हम भी एक तुच्छ से जीव मात्र है. लेकिन फिर भी हमारी एक पहचान है. जिसके बारे में मेरे कुछ दोस्त अक्सर मेरी प्रोफाइल की इन्फो देखें बिना ऐसी बातें पूछते रहते हैं. जो मैंने पहले से फेसबुक/ ऑरकुट/ गूगल पर डाल रखी है. अगर आप थोड़ा सा ध्यान से किसी की प्रोफाइल देख लें तो आपको काफी बातें पूछनी नहीं पड़ेगी और आपका व आपके दोस्त का काफी समय बच जायेगा. इसको एक बार ध्यान से पढ़ लो. आप मेरी उपरोक्त पोस्ट को अन्थया ना लें.

        कार्य एवं शिक्षा :-
नियोक्ता:-   शकुन्तला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन
    पागल संपादक · 11 अक्टूबर 1997 से अब तक
    "शकुंतला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन" परिवार द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाएँ-जीवन का लक्ष्य (पाक्षिक) शकुंतला टाइम्स (मासिक), शकुंतला सर्वधर्म संजोग (मासिक), शकुंतला के सत्यवचन (साप्ताहिक) , उत्तम बाज़ार (त्रैमासिक)
 स्वामी (Proprietor) :-  शकुंतला एडवरटाईजिंग एजेंसी
           20 सितंबर 1995 से अब तक
व्यवसाय: प्रकाशक, मुद्रक, संपादक, स्वतंत्र पत्रकारिता व विज्ञापन बुकिंग.
"शकुंतला एडवरटाईजिंग एजेंसी"द्वारा सभी पत्र-पत्रिकायों की विज्ञापन बुकिंग होती है.
महाविद्यालय:-कालेज जाने का सौभाग्य ही नहीं मिला था, इसलिए आप अगूंठा छाप कह सकते हैं
उच्च माध्यमिक :-केवल स्कूल तक जाने का सौभाग्य प्राप्त है.

निवास:-वर्तमान शहर नई दिल्ली, New Delhi, India (मूलस्थान) जिला-जींद, हरियाणा
परिवार:-कैमरा- तीसरी आँख Partner(सहयोगी), रमेश कुमार सिरफिरा Partner(सहयोगी),

       वार्षिक इतिहास:-
1997-शकुन्तला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन में काम करना शुरू किया
1976- 20 अक्टूबर 1976 को जन्म हुआ
 

 अपने बारे में :-
मुझे देशभक्त, सिरफिरा पत्रकार, हिंदीप्रेमी और पत्रकारिता के क्षेत्र में सिरफिरा प्रेसरिपोर्टर के नाम से पहचाना जाता है.अन्याय का विरोध करना और अपने अधिकारों हेतु जान की बाज़ी तक लगा देना.हास्य-व्यंग साहित्य, लघुकथा-कहानी-ग़ज़ल-कवितायों का संग्रह,कानून की जानकारी वाली और पत्रकारिता का ज्ञान देने वाली किताबों का अध्ययन, लेखन, खोजबीन और समस्याग्रस्त लोगों की मदद करना.एक सच्चा, ईमानदार,स्वाभिमानी और मेहनती इंसान के रूप में पहचान.मै अपने क्षेत्र दिल्ली से चुनाव चिन्ह "कैमरा" पर निर्दलीय प्रत्याक्षी के रूप में तीन चुनाव लड़ चुका हूँ.दिल्ली नगर निगम 2007और 2012,वार्ड न.127 व 128 के साथ ही उत्तमनगर विधानसभा 2008 के तीनों चुनाव में बगैर किसी को दारू पिलाये ही मात्र अपनी अच्छी विचारधारा से काफी अच्छे वोट हासिल किये थें.मेरी फर्म-"शकुंतला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन" परिवार द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाएँ :- जीवन का लक्ष्य (पाक्षिक),शकुंतला टाइम्स (मासिक), शकुंतला सर्वधर्म संजोग (मासिक), शकुंतला के सत्यवचन (साप्ताहिक), उत्तम बाज़ार (त्रैमासिक) "शकुंतला एडवरटाईजिंग एजेंसी" द्वारा सभी पत्र-पत्रिकायों की विज्ञापन बुकिंग होती है.
     दोस्तो, शोषण की भट्टी में खुद को झोंककर समाचार प्राप्त करने के लिए जलता हूँ. फिर उस पर अपने लिए और दूसरों के लिए महरम लगाने के एक बकवास से कार्य को लेखनी से अंजाम देता हूँ. आपका यह नाचीज़ दोस्त समाज हित में लेखन का कार्य करता है और कभी-कभी लेख की सच्चाई के लिए रंग-रूप बदलकर अनुभव प्राप्त करना पड़ता है. तब जाकर लेख का विषय पूरा होता है. इसलिए पत्रकारों के लिए कहा जाता है कि रोज पैदा होते हैं और रोज मरते हैं. बाकी आप अंपने विचारों से हमारे मस्तिष्क में ज्ञानरूपी ज्योत का प्रकाश करें. निष्पक्ष, निडर, अपराध विरोधी व आजाद विचारधारा वाला प्रकाशक, मुद्रक, संपादक, स्वतंत्र पत्रकार, कवि व लेखक रमेश कुमार जैन उर्फ सिरफिरा. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना हैं ज़ोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है.

हम भी नवभारत टाइम्स पर एक छोटा सा ब्लॉग लिखते है,  कभी फुर्सत मिले तो पढ़ें -  http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/SIRFIRAA-AAJAD-PANCHHI/

    मेरे अन्य ब्लोग्स भी है :-
रमेश कुमार सिरफिरा http://rksirfiraa.blogspot.in
सिरफिरा-आजाद पंछी http://sirfiraa.blogspot.in
कैमरा-तीसरी आँख http://kaimra.blogspot.in
सच का सामना(आत्मकथा)
 http://sach-ka-saamana.blogspot.in
सच्चा दोस्त http://sachchadost.blogspot.in
आपकी शायरी http://aap-ki-shayari.blogspot.in
मुबारकबाद http://mubarakbad.blogspot.in
आपको मुबारक हो http://aapkomubarakho.blogspot.in
शकुन्तला प्रेस ऑफ इंडिया प्रकाशन  http://shakuntalapress.blogspot.in
तीर्थंकर महावीर स्वामी जी http://tirthnkarmahavir.blogspot.in
शकुन्तला प्रेस का पुस्तकालय http://laibreri.blogspot.in

      मूलभूत जानकारी:-
जन्मदिन-20 अक्टूबर 1976 लिंग-पुरुष, इसमें रुचि है-पुरुष व स्त्री (Men and Women)
संबंध की स्थिति:-अकेला, एकल  (Separated)  भाषाएँ- हिन्दी-Hindi, पंजाबी-Punjabi,भोजपुरी-Bhojpuri और
हरियाणवीं-Hariyanvin ईमेल: rksirfiraa@gmail.com, कार्य ईमेल: sirfiraa@gmail.com
बच्चे: नहीं  जातीयता: एशियाई  धर्म: जैन, हिंदू   हास्य: बड़बोला/नक़लची, चतुर/शातिर, मैत्रीपूर्ण, गूढ़  
फ़ैशन: वैकल्पिक, न्यूनतम धूम्रपान: नहीं  मदिरापान: नहीं   
पालतू जानवर: मुझे पालतु पशु पसंद हैं जीवनशैली: अकेला, अभिभावकों के साथ
दीवानगी: अन्याय का विरोध, स्पोर्ट: क्रिकेट  खान-पान: साधारण शिक्षा: प्राथमिक  
हाई स्कूल: कक्षा दसवीं ही पास की हुई है. वर्ष: 1991 महाविद्यालय/विश्वविद्यालय: सौभाग्य नहीं मिला.
आंखों का रंग: काला बालों का रंग: काला बनावट: दुबला दिखावट: औसत  सर्वोत्तम विशेषता: होंठ
पसंद: दृढ़ता, कैंडललाइट, बुद्धिमता, लंबे बाल, स्नेह के प्रदर्शन
रुचि:- एक अभिलाषा-भ्रष्टाचार मुक्त, सर्वक्षेष्ट व समृध्द भारत देश में प्रजातंत्र, कभी-कभार फुर्सत मिलने पर ही:-क्रिकेट देखना और खेलना, सांप-सीढ़ी और लूडो खेलना, दिमागी कसरत वाली गेम कंप्यूटर व टी.वी. पर खेलना.  
पसंदीदा मूवी्स:- ऐसे सीरियल देखना जिनमें हंसी-मजाक के साथ कोई अच्छा संदेश हो और पारवारिक होने के साथ जीवन की राह पर चलने में मदद करते हो, देशभक्ति की प्रेरणा देने वाली फ़िल्में देखना  
पसंदीदा संगीत:- दर्द भरी गज़ल, हरियाणवी-पंजाबी लोकगीत, दर्द भरे-रोमांटिक-हिंदी पुराने व नये गाने, एफ.एम रेडियो आदि सुनना पसंदीदा  
पुस्तकें:- गृहशोभा-सरिता-गृहलक्ष्मी,  सत्य के प्रयोग (आत्मकथा-मोहन दास करमचंद गांधी), क्रांतिवीर सुभाषचन्द्र बोस, भारत के लाल-लाल बहादुर शास्त्री, अपराध कानून संहिता
धार्मिक विचार- जैन-Jain, श्वेताम्बर-Shwetamber
    तेरापंथी श्वेताम्बर, जैन. जिसके बारें में कहा जाता है कि-जैन धर्म की जाने वाली तपस्या विश्व में की जाने वाली तपस्यों में सबसे कठिन है.

    भगवान् महावीर स्वामी जी के समूह में आप भी शामिल हो और दोस्तों को भी करें:- http://www.facebook.com/groups/mahavirswamiji/ और ब्लॉग www.tirthnkarmahavir.blogspot.in देखें. भगवान महावीर स्वामी जी का सच्चा संदेश पूरे विश्व में फैले और जैन समाज में कुछ फैली कुरीतियों पर रोक लगे.जिससे संपूर्ण संसार जगत में द्वेष भावना खत्म होकर प्यार-प्रेम और भाईचारा कायम हो."जैन" कोई जाति नहीं, धर्म है.जैन-धर्म के सिध्दांतों में जो दृढ विश्वास रखता है और उनके अनुसार आचरण करता है, वही सच्चा जैन कहलाता है.इसको कोई भी अपनी स्वेच्छा से अपना सकता है

राजनैतिक विचार:-"राजनीति" सेवा करने का मंच है.
    हमारे देश के स्वार्थी नेता "राज-करने की नीति से कार्य करते हैं" और मेरी विचारधारा में "राजनीति" सेवा करने का मंच है.

    दोस्तों, क्या आप सोच सकते हैं कि "अनपढ़ और गँवार" लोगों का भी कोई ग्रुप इन्टरनेट की दुनिया पर भी हो सकता है. मैं आपका परिचय एक ऐसे ही ग्रुप से करवा रहा हूँ. जो हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु हिंदी प्रेमी ने बनाया है. जो अपना "नाम" करने पर विश्वास नहीं करता हैं बल्कि अच्छे "कर्म" करने के साथ ही देश प्रेम की भावना से प्रेरित होकर अपने आपको "अनपढ़ और गँवार" की संज्ञा से शोभित कर रहा है.अगर आपको विश्वास नहीं हो रहा, तब आप इस लिंक पर जाकर देख लो. http://www.facebook.com/groups/anpadh/ क्या आप भी उसमें शामिल होना चाहेंगे? फ़िलहाल इसके सदस्य बहुत कम है, मगर बहुत जल्द ही इसमें लोग शामिल होंगे. कृपया शामिल होने से पहले नियम और शर्तों को अवश्य पढ़ लेना आपके लिए हितकारी होगा.एक बार जरुर देखें.

         संपर्क जानकारी:-
मोबाइल फ़ोन : 099 10 350461 Verify   098 68 262751 (सत्यापित-Verify)
अन्य फोन Other Phones     011 2856 3826    घर
पता: शकुंतला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन, A-34-A,शीशराम पार्क, सामने-शिव मंदिर, उत्तम नगर, राज्य: दिल्ली, पिन कोड: 110059
Screen Names- जैन गूगल बातचीत, सिरफिरा Orkut

                 वेबसाइट :-
रमेश कुमार सिरफिरा http://rksirfiraa.blogspot.in
सिरफिरा-आजाद पंछी http://sirfiraa.blogspot.in
कैमरा-तीसरी आँख http://kaimra.blogspot.in
सच का सामना(आत्मकथा) 
http://sach-ka-saamana.blogspot.in
सच्चा दोस्त http://sachchadost.blogspot.in
आपकी शायरी http://aap-ki-shayari.blogspot.in
मुबारकबाद http://mubarakbad.blogspot.in
आपको मुबारक हो http://aapkomubarakho.blogspot.in
शकुन्तला प्रेस ऑफ इंडिया प्रकाशन  http://shakuntalapress.blogspot.in
तीर्थंकर महावीर स्वामी जी http://tirthnkarmahavir.blogspot.in
शकुन्तला प्रेस का पुस्तकालय http://laibreri.blogspot.in  और
(जिनपर कार्य चल रहा है,जल्द ही में पूरा होने की संभवाना है)
शकुन्तला महिला कल्याण कोष 
 http://shakuntala-mkk.blogspot.in
मानव सेवा एकता मंच http://manawsewa.blogspot.in


  मेरे द्वारा फेसबुक पर डाली फोटोग्राफ्स :-
https://www.facebook.com/kaimara200/photos
समय की परत ने मासूमित से एक जिम्मेदार इंसान बनाने में बहुत मदद की. समय के साथ-साथ चेहरा बदला, शौक बदले, कार्यशैली बदली, रुढ़िवादी विचारों ने साथ छोड़ा, नए विचारों का आगमन हुआ. मैट्रिक कक्षा से लेकर अब तक के मेरे कुछ पुराने चित्रों का यहाँ पर  अवलोकन आप भी करें.
https://www.facebook.com/media/set/?set=a.404481089606606.94312.100001341566208&type=3&l=bb584d3c49

     पसन्दीदा उक्तियाँ :-
ईमानदारी सर्वश्रेष्‍ठ नीति है,अभ्‍यास परिपूर्ण बनाता है. प्रत्येक व्यक्ति अपना भाग्य ख़ुद बनाता है.सादगी ही सर्वश्रेष्ठ दुनियादारी है.

मेरे/अपने बारे में एक वेबसाइट को अपनी जन्मतिथि, समय और स्थान भेजने के बाद यह कहना है कि-आप अपने पिछले जन्म में एक थिएटर कलाकार थे. आप कला के लिए जुनून अपने विचारों में स्वतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं. यह पता नहीं कितना सच है, मगर अंजाने में हुई किसी प्रकार की गलती के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ . हम बस यह कहते कि-आप आये हो, एक दिन लौटना भी होगा.फिर क्यों नहीं? तुम ऐसा करों तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हें पूरी दुनियां हमेशा याद रखें.धन-दौलत कमाना कोई बड़ी बात नहीं, पुण्य/कर्म कमाना ही बड़ी बात है.

क्या पत्रकार केवल समाचार बेचने वाला है? नहीं. वह सिर भी बेचता है और संघर्ष भी करता है. उसके जिम्मे कर्त्तव्य लगाया गया है कि-वह अत्याचारी के अत्याचारों के विरुध्द आवाज उठाये. एक सच्चे और ईमानदार पत्रकार का कर्त्तव्य हैं, प्रजा के दुःख दूर करना, सरकार के अन्याय के विरुध्द आवाज उठाना, उसे सही परामर्श देना और वह न माने तो उसके विरुध्द संघर्ष करना. वह यह कर्त्तव्य नहीं निभाता है तो वह भी आम दुकानों की तरह एक दुकान है किसी ने सब्जी बेच ली और किसी ने खबर.

समय की मांग,हिंदी में काम.हिंदी के प्रयोग में संकोच कैसा,यह हमारी अपनी भाषा है.हिंदी में काम करके,राष्ट्र का सम्मान करें.हिन्दी का खूब प्रयोग करे.इससे हमारे देश की शान होती है.राष्ट्र के प्रति हर व्यक्ति का पहला धर्म है अपने राष्ट्र की राष्ट्रभाषा का सम्मान करना.नेत्रदान महादान आज ही करें.आपके द्वारा किया रक्तदान किसी की जान बचा सकता है.

मंगलवार, सितंबर 11, 2012

प्यार एक अहसास है

वाह! क्या कहने है? किसी ने क्या खूब पक्तियां कही है कि-प्यार एक अहसास है,एक ऐसा एहसास जिसने लाखों लोगों के सपने संजोये, लाखों मुर्दा दिलों को जीने की राह दिखाई....... एक ऐसा एहसास जिसने लाखों लोगों को जीते जी मार दिया, वे ना जी सके और ना ही मर सके, बस एक जिन्दा लाश बनकर रह गए......प्यार जो पूजा भी है...... प्यार जो जिन्दा इंसान की मौत का कारण भी है और उसका कफन भी है... प्यार हरेक के लिए कुछ अलग, कुछ जुदा, कुछ खट्टा और कुछ मीठा है. कुछ लोग मोहब्बत करके हो जाते हैं बर्बाद, कुछ लोग मोहब्बत करके कर देते हैं बर्बाद.

रविवार, अगस्त 26, 2012

गुड खाना और गुलगुलों से परहेज करना

काश ! हमारे देश के सभी बुद्धिजीवी भी हिंदी के प्रति पूरे ईमानदार होकर ज्यादा से ज्यादा हिंदी का प्रयोग करते हुए अपनी सभी बातें/विचार/रचना हिंदी में फेसबुक/टिवटर आदि पर डाले. तब कुछ हिंदी की स्थिति में सुधार संभव है. आज हिंदी की इतनी बुरी स्थिति हिंदी के चाहने वालों की वजह से है. कई तो कहते हैं कि हम हिंदी से अपनी माँ जितना प्यार करते है.मगर फेसबुक/टिवटर आदि पर अपने विचार/बातें/रचनाएँ अंग्रेजी या रोमन लिपि में डालते हैं यानि गुड खाते हैं और गुलगुलों से परहेज करते हैं. 
जब जब भारत देश में हिंदी दिवस आता है तब एक दिन के लिए कलाकार (अभिनेता / अभिनेत्री), पत्रकार, कवि और साहित्यकार हिंदी का गुणगान करते नजर आते हैं और अपनी टिप्पणी/विचारों को ऐसे व्यक्त करते हैं. जैसे उन से ज्यादा बड़ा तो कोई हिंदी प्रेमी इस भारत वर्ष में कोई हैं ही नहीं. उसके बाद 364 दिन हिंदी को अपनी दुश्मन के समान समझते हैं. हिंदी के बड़े-बड़े कलाकार (अभिनेता / अभिनेत्री), पत्रकार, कवि और साहित्यकार आदि अपने नाम को सोशल वेबसाईट (फेसबुक,गूगल,ट्विट्टर आदि) पर (अपनी प्रोफाइल में) हिंदी में लिखना तक पसंद नहीं करते हैं, क्योंकि कहीं लोग उनको "अनपढ़ और गंवार" ना समझे.
 मैंने कई अवसरों पर देखा है कि कई कलाकार (अभिनेता / अभिनेत्री), पत्रकार, कवि और साहित्यकार आदि कमाई तो हिंदी की खाते हैं और जब सोशल वेबसाइट पर अपना स्टेटस (गरिमा) दिखाने के लिए हिंदी से मुँह छुपाते नजर आते हैं. इसमें एक आध अपवाद छोड़ दें, क्योंकि कई लोगों फेसबुक आदि पर हिंदी लिखने से संबंधित जानकारी नहीं होती है. वरना.....अधिकांश के पास समय ही नहीं होता है, क्योंकि हिंदी लिखने के लिए थोड़ी ज्यादा मेहनत और समय की जरूरत है.
फेसबुक  प्रयोगकर्त्ताओं के लिए जानकारी:-
प्रश्न:-मुझे देवनागरी में नाम लिखने से सर्च करने में परेशानी होती है....इसलिए मैंने रोमन में लिखा हुआ है.....जो भी नाम देवनागरी में लिखे हैं, वो सर्च करने पर नहीं मिलते हैं.  
उत्तर:-अपनी प्रोफाइल में हिंदी में नाम कैसे लिखें:-आप सबसे पहले "खाता सेट्टिंग " में जाए. फिर आप "नेम एडिट" को क्लिक करें. वहाँ पर प्रथम,मिडिल व लास्ट नाम हिंदी में भरें और डिस्प्ले नाम के स्थान पर अपना पूरा नाम हिंदी में भरें. उसके बाद नीचे दिए विकल्प वाले स्थान में आप अपना नाम अंग्रेजी में भरने के बाद ओके कर दें. अब आपको कोई भी सर्च के माध्यम से तलाश भी कर सकता है और आपका नाम हर संदेश और टिप्पणी पर देवनागरी हिंदी में भी दिखाई देगा. अब बाकी आपकी मर्जी. हिंदी से प्यार करो या बहाना बनाओ.

गुरुवार, जुलाई 26, 2012

सिरफिरा-आजाद पंछी

पिंजरा चाहे सोने का ही क्यों ना लेकिन कैद तो कैद होती है.
किसी आजाद पंछी से पूछो "आजादी" क्या मतलब होता है ?
 अपने बारे में एक वेबसाइट को अपनी जन्मतिथि,समय और स्थान भेजने के बाद यह कहना है कि-आप अपने पिछले जन्म में एक थिएटर कलाकार थे. आप कला हेतु जुनून,अपने विचारों में स्वतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं.मुझे पता नहीं यह कितना सच है लेकिन आमआदमी को अपने विचारों व अनुभव द्वारा अन्याय का विरोध व अपने अधिकारों को लेने हेतु प्रेरित करने की एक छोटी-सी कोशिश ही है उपरोक्त ब्लॉग.

क्या पत्रकार केवल समाचार बेचने वाला है? नहीं.वह सिर भी बेचता है और संघर्ष भी करता है.उसके जिम्मे कर्त्तव्य लगाया गया है कि-वह अत्याचारी के अत्याचारों के विरुध्द आवाज उठाये.एक सच्चे और ईमानदार पत्रकार का कर्त्तव्य हैं,प्रजा के दुःख दूर करना,सरकार के अन्याय के विरुध्द आवाज उठाना,उसे सही परामर्श देना और वह न माने तो उसके विरुध्द संघर्ष करना. वह यह कर्त्तव्य नहीं निभाता है तो वह भी आम दुकानों की तरह एक दुकान है किसी ने सब्जी बेचली और किसी ने खबर.
पहले हमने यह भी लिखा हैRelated Posts Plugin for WordPress, Blogger...
यह है मेरे सच्चे हितेषी (इनको मेरी आलोचना करने के लिए धन्यवाद देता हूँ और लगातार आलोचना करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद करता हूँ)
पाठकों और दोस्तों मुझसे एक छोटी-सी गलती हुई है.जिसकी सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगता हूँ. अधिक जानकारी के लिए "भारतीय ब्लॉग समाचार" पर जाएँ और थोड़ा-सा ध्यान इसी गलती को लेकर मेरा नजरिया दो दिन तक "सिरफिरा-आजाद पंछी" पर देखें.

आदरणीय शिखा कौशिक जी, मुझे जानकारी नहीं थीं कि सुश्री शालिनी कौशिक जी, अविवाहित है. यह सब जानकारी के अभाव में और भूलवश ही हुआ.क्योकि लगभग सभी ने आधी-अधूरी जानकारी अपने ब्लोगों पर डाल रखी है. फिर गलती तो गलती होती है.भूलवश "श्रीमती" के लिखने किसी प्रकार से उनके दिल को कोई ठेस लगी हो और किसी भी प्रकार से आहत हुई हो. इसके लिए मुझे खेद है.मुआवजा नहीं देने के लिए है.अगर कहो तो एक जैन धर्म का व्रत 3 अगस्त का उनके नाम से कर दूँ. इस अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.

मेरे बड़े भाई श्री हरीश सिंह जी, आप अगर चाहते थें कि-मैं प्रचारक पद के लिए उपयुक्त हूँ और मैं यह दायित्व आप ग्रहण कर लूँ तब आपको मेरी पोस्ट नहीं निकालनी चाहिए थी और उसके नीचे ही टिप्पणी के रूप में या ईमेल और फोन करके बताते.यह व्यक्तिगत रूप से का क्या चक्कर है. आपको मेरा दायित्व सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए था.जो कहा था उस पर आज भी कायम और अटल हूँ.मैंने "थूककर चाटना नहीं सीखा है.मेरा नाम जल्दी से जल्दी "सहयोगी" की सूची में से हटा दिया जाए.जो कह दिया उसको पत्थर की लकीर बना दिया.अगर आप चाहे तो मेरी यह टिप्पणी क्या सारी हटा सकते है.ब्लॉग या अखबार के मलिक के उपर होता है.वो न्याय की बात प्रिंट करता है या अन्याय की. एक बार फिर भूलवश "श्रीमती" लिखने के लिए क्षमा चाहता हूँ.सिर्फ इसका उद्देश्य उनको सम्मान देना था.
कृपया ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिंक देखे. पूरी बात को समझने के लिए http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html,
गलती की सूचना मिलने पर हमारी प्रतिक्रिया: http://blogkeshari.blogspot.com/2011/07/blog-post_4919.html

यह हमारी नवीनतम पोस्ट है: